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Showing posts from October, 2025

सुन्दर काण्ड दोहा (59)

 सुन्दर काण्ड दोहा 59 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो० – सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।। 59।। शब्दार्थ : सुनत बिनीत बचन – विनम्र वचनों को सुनकर, अति कह कृपाल मुसुकाइ – अत्यंत कृपालु श्रीराम मुस्कुराकर बोले, जेहि बिधि उतरै कपि कटकु – जिस उपाय से वानर सेना पार उतर सके, तात सो कहहु उपाइ – हे तात (सागर), वह उपाय बताओ। भावार्थ : जब सागर ने तीन दिन तक रामजी की प्रार्थना नहीं सुनी, तब श्रीराम क्रोधित होकर उसे सुखाने की बात कहते हैं। लक्ष्मण जी ने उनके आदेश पर धनुष-बाण तैयार कर लिया। उसी समय सागर देव भयभीत होकर प्रकट हुए और अत्यंत विनम्रता से भगवान से क्षमा माँगने लगे। सागर की विनम्र बातों को सुनकर भगवान श्रीराम करुणा से मुस्कुराए और कोमल स्वर में बोले — “हे तात! अब तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे यह वानर सेना समुद्र पार उतर सके।” विस्तृत विवेचन : यह दोहा भगवान श्रीराम की करुणा और क्षमाशीलता को प्रकट करता है। तीन दिन की प्रतीक्षा और सागर के मौन के बाद भी जब भगवान ने क्रोध दिखाया, तो वह धर्म की रक्षा हेतु था, न कि अहंकारवश। परंतु जैसे ही सागर न...

सुन्दर काण्ड चौपाई (407-413)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 407-413 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।। तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।। प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।। प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।। ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।। प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।। प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।। भावार्थ (सरल अर्थ): भयभीत होकर सागर प्रभु श्रीराम के चरण पकड़कर कहता है  “हे नाथ! मेरे सब अपराध क्षमा करें। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — ये पाँच तत्व स्वभाव से ही जड़ हैं। इन्हें आपने ही माया से सृष्टि-कार्य के लिए बनाया है। जिसको जैसा कार्य सौंपा है, वह उसी रूप में रहता है और वैसा ही सुख पाता है। आपने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी। अब मेरी मर्यादा भी आपने ही रखी। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी — इन सबको ताड़ना (अनुशासन) का अधिकारी कहा गया है। हे प्रभु! आपके प्रताप से मैं सूख जाऊ...

सुन्दर काण्ड दोहा (58)

 सुन्दर काण्ड दोहा 58 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा: काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।। भावार्थ (सरल अर्थ): हे गरुड़ जी!जैसे केले का पेड़ काट देने पर भी फिर से उग आता है, और चाहे कोई उसे कितना भी बार-बार सींचे या सँभाले, उसकी प्रकृति (मुलायमपन और नर्मी) नहीं बदलती। उसी प्रकार, नीच स्वभाव के व्यक्ति को चाहे कितनी ही विनम्रता और नम्र व्यवहार से समझाया जाए, वह नहीं मानता; उसे तो डाँटकर, कठोर व्यवहार से ही वश में किया जा सकता है। विस्तृत विवेचन: यह दोहा श्रीराम और समुद्र के संवाद के प्रसंग में आता है। भगवान राम तीन दिन तक नम्रता से समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करते रहे, परंतु जब समुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया, तब भगवान ने क्रोधित होकर कहा —  "हे गरुड़जी! जैसे केले के पेड़ को काटने पर भी वह फिर उग आता है, वैसे ही दुष्ट और नीच स्वभाव के लोग नम्रता से नहीं सुधरते। उन्हें केवल कठोरता और दंड से ही वश में किया जा सकता है।" इसमें तुलसीदास जी नीच व्यक्ति के स्वभाव की अडिगता बताना चाहते हैं। सज्जन व्यक्ति प्रेम और विनम्रता से सुध...

सुन्दर काण्ड चौपाई (399-406)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 399-406 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।। सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।। ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।। क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।। अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।। संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।। मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।। कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।। यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में उस प्रसंग से संबंधित है जब भगवान श्रीराम समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करते हैं, परंतु जब तीन दिन तक भी समुद्र नहीं मानता, तब श्रीराम क्रोधित होकर उसे सुखाने का निश्चय करते हैं। इस चौपाई में भगवान का धैर्य, नीति और धर्म-भावना स्पष्ट झलकती है। भावार्थ जब सागर ने श्रीराम की विनती नहीं मानी, तब श्रीराम ने कहा — “लक्ष्मण! धनुष और बाण लाओ। अब इस जल को बाणों की अग्नि से सुखा दूँगा।” भगवान कहते हैं कि — मूर्ख के साथ विनम्रता, कपटी के साथ प्रेम, कंजूस के साथ सुंदर नीति, मोह में डूबे व्यक्ति को ज्ञान, ...

सुन्दर काण्ड दोहा (57)

 सुन्दर काण्ड दोहा 57 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।। शब्दार्थ – बिनय – विनम्र निवेदन जड़ – मूर्ख, हठी सकोप – क्रोधित होकर भय बिनु होइ न प्रीति – बिना डर के प्रेम नहीं होता भावार्थ – भगवान श्रीराम ने समुद्र से अत्यन्त विनम्रतापूर्वक तीन दिन तक मार्ग देने की प्रार्थना की, परन्तु वह जड़ (हठी) समुद्र अपनी मर्यादा और हठ छोड़कर भी नहीं माना। तीन दिन बीत जाने पर श्रीराम को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा — “जहाँ भय नहीं होता, वहाँ प्रेम भी नहीं टिकता।” विस्तृत विवेचन – इस दोहे में भगवान श्रीराम के धैर्य, मर्यादा और न्यायप्रिय स्वभाव का अद्भुत चित्रण है। उन्होंने पहले समुद्र से शान्तिपूर्वक निवेदन किया कि वानरसेना को लंका पहुँचने के लिए मार्ग दो। किन्तु समुद्र ने उत्तर नहीं दिया। तीन दिन तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब जलधि नहीं पसीजा, तो श्रीराम ने यह कहा कि – “मूर्ख और हठी व्यक्ति केवल विनम्रता से नहीं मानते, उन्हें अनुशासन और भय से ही सुधारा जा सकता है।” इससे यह शिक्षा मिलती है कि – 👉 विनम्रता और नम्र व्यवहा...

सुन्दर काण्ड चौपाई (387-398)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 387-398 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।। भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।। कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।। सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।। अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।। मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।। जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।। जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।। नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।। करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।। रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।। बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।। भावार्थ (सरल अर्थ) जब शुक और धारण ( रावण के गुप्तचर)ने सभा में रामजी की महिमा कहकर रावण को समझाया तो रावण हँस पड़ा, सबको सुनाते हुए बोला – “यह तो कोई छोटा तपस्वी  है जो मेरे बगीचे में उपद्रव कर गया। गुप्तचरों ने फिर समझाया – “हे नाथ! मेरी सारी बातें सत्य हैं। अभिमान छोड़कर सोचिए। रामजी अत्यंत कोमल स्वभा...

सुन्दर काण्ड दोहा(56)

  दो0–बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।। की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।। भावार्थ (संक्षेप में)  रावण के गुप्तचर रावण को समझाते हुए कहते हैं — हे मूर्ख रावण! मीठी बातों से अपने मन को मत बहला। श्रीराम से विरोध करने वाला न तो विष्णु, न ब्रह्मा, न शिव — कोई भी बच नहीं सकता। अब दो ही रास्ते हैं — या तो अपने अभिमान को छोड़कर प्रभु श्रीराम के चरणों में भृंग (भँवरे) की तरह लग जा, या फिर अपने कुल सहित राम के बाण रूपी अग्नि में पतंग की तरह जल जाएगा। विस्तृत विवेचन: जब गुप्तचर ने रावण को अनेक प्रकार से समझाया कि श्रीराम साक्षात् परमात्मा हैं, तब भी रावण अहंकार में डूबा रहा। इस पर गुप्तचर ने यह दोहा कहा। पहला भाग (56क): गुप्तचर कहते हैं — हे रावण! व्यर्थ की बातों से अपने मन को धोखा मत दे। श्रीराम से विरोध करना मृत्यु को बुलाना है। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिव तक यदि राम के विरोधी बनें तो उनका भी उद्धार नहीं हो सकता। तो फिर तेरा क्या होगा? दूसरा भाग (56ख): अब तेरे सामने दो मार्ग हैं — 1. ‘तज...

सुन्दर काण्ड चौपाई (377-386)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 377-386 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।। सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।। तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।। सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।। सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।। मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।। सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।। सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।। रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।। बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।: यह चौपाई उस समय की है जब रावण ने अपने गुप्तचरों से राम और उसकी सेना के बारे में बताने को कहा: चौपाई राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।। सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।। भावार्थ: श्रीराम का तेज, बल और बुद्धि असीम है; सहस्रमुखी शेषनाग भी उनकी महिमा का वर्णन नहीं कर सकते। वे तो एक बाण से सौ समुद्रों को सुखा सकते हैं, फिर भी उन्होंने मर्यादा और नीति का पालन करते हुए सागर से मार्ग माँगना उचित समझ...

सुन्दर काण्ड दोहा (55)

 सुन्दर काण्ड दोहा 55 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।। 💬 भावार्थ इस दोहा में गुप्तचर रावण को राम की सेना के बारे में बता रहे हैं  वानर और भालू सब स्वभाव से ही वीर हैं। ऊपर से उनके सिर पर भगवान श्रीराम का आशीर्वाद और संरक्षण भी है। फिर सोचो — ऐसे में यदि रावण जैसे लाखों काल (मृत्यु समान बलशाली) शत्रु भी सामने आएं, तो भी वे युद्ध में उन्हें जीत सकते हैं। 🕉️ विस्तृत विवेचन इस दोहे मे रावण के गुप्तचर रामसेना की अजेय शक्ति का वर्णन किया है— 1. सहज वीरता – वानर और भालू जाति के प्राणी स्वभाव से ही उत्साही, बलवान और पराक्रमी हैं। युद्ध उनका स्वभाव है। 2. रामकृपा का प्रभाव – जब भगवान श्रीराम का कृपाश्रय उनके सिर पर है, तो उनकी शक्ति अनंत हो जाती है। भगवान की कृपा से वे किसी भी बलशाली शत्रु को जीत सकते हैं। 3. रावण की तुलना काल से की है - गुप्तचर कहते हैं कि यदि रावण जैसे असंख्य काल समान शत्रु भी सामने हों, तब भी रामभक्तों की विजय निश्चित है। 👉 इस प्रकार यह दोहा भक्ति और दिव्य शक्ति के मेल का अद...

सुन्दर काण्ड चौपाई (369-376)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 369-376 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।। राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।। अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।। नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।। परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।। सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।। मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।। गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।। भावार्थ (सरल भाषा में): रावण के गुप्तचर रावण से कहते हैं — हे राक्षसराज! ये सभी वानर राजा सुग्रीव के समान ही बलवान हैं। इनके समान करोड़ों वानर हैं, जिन्हें गिनना असंभव है। श्रीराम की कृपा से इन सबके बल की कोई सीमा नहीं है; उनके लिए यह तीनों लोक तिनके समान तुच्छ हैं। मैंने सुना है कि इनके अठारह पद्म (असंख्य) समूह हैं, और उनमें एक भी वानर ऐसा नहीं है जो युद्ध में तुमको न जीत सके। यदि श्रीराम आज्ञा दें तो ये सब वानर क्रोध में आकर अपने हाथों से सागर को सोख लें, मछलियों और नागों समेत। और यदि चाहें...

सुन्दर काण्ड दोहा (54)

 सुन्दर काण्ड दोहा 54 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।। भावार्थ (सरल अर्थ): रावण के गुप्तचरों ने रामसेना के प्रमुख योद्धाओं का वर्णन किया है। द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकट, दधिमुख, केहरी, निषठ और जाम्बवान — ये सब महाबली वानर हैं। इन सबमें जाम्बवान (भालू-राज) को "बलराशि" यानी बल का भंडार कहा गया है। विस्तृत विवेचन: इस दोहे में रावण के गुप्तचरों ने रामभक्तों की वीरता और निष्ठा को प्रकट किया है। 1. रामसेना के नायक: यहाँ जो नाम लिए गए हैं — द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकट, दधिमुख, केहरी, निष्ठ — ये सब उस वानरसेना के प्रमुख सेनानायक हैं जिन्होंने लंका विजय में श्रीराम का साथ दिया। नील-नल ने समुद्र पर पुल बनाया। अंगद ने रावण के दरबार में जाकर राम का संदेश सुनाया। जाम्बवान ने सबका नेतृत्व कर बुद्धि और अनुभव से सबको एकजुट किया। 2. जाम्बवान बलरासि: रावण के गुप्तचरों ने जाम्बवान को "बलराशि" कहा है — इसका अर्थ है कि वे न केवल शारीरिक बल से प्रबल हैं, बल्कि धैर्य, विवेक और नेतृत्व...

सुन्दर काण्ड चौपाई (361-368)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 361-368 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।। मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।। रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।। श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।। पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।। नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।। जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।। अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।। इस चौपाई का प्रसंग है — जब रावण ने गुप्तचरों से राम की सेना और विभीषण के बारे में पूछा । चौपाई नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।। मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।। भावार्थ: हे रावण! जैसे आपने मुझसे कृपा कर पूछ लिया है, वैसे ही मेरा उत्तर भी बिना क्रोध किए समझना। जब तुम्हारा अनुज विभीषण श्रीराम से मिला, तभी श्रीराम ने उसे राज्य का तिलक कर दिया। अर्थात्, अब लंका पर राम का ही अधिकार है। विवेचन: गुप्तचर बड़ी नीति से रावण को समझाते हैं कि श्रीराम की कृपा असीम है।...

सुन्दर काण्ड दोहा (53)

 सुन्दर काण्ड दोहा 53 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0–की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।। भावार्थ रावण अपने गुप्तचरों से कहता जिसे उन्होंने विभीषण के पीछे भेजा था और जो लक्ष्मण का पत्र लेकर आया है कि — क्या तुमने उनसे मुलाकात की या वे लोग मेरी कीर्ति को सुनकर यहां से वापस लौट गए। तुम शत्रु के तेज और बल के बारे में बता नहीं रहे हो और तुम दिल से बहुत आश्चर्यचकित हो। विस्तृत विवेचन 1. संदर्भ (किस बात का समाचार) दोहे में बताई 'भेंट' से तात्पर्य वह घटना/मुलाक़ात है जिसके बारे में रावण अपने गुप्तचरों से जानना चाहते हैं। 2. शब्दार्थ और सूक्ष्मता की भइ भेंट कि फिरि गए — किस प्रकार की (aisi) भेंट/मुलाक़ात हुई कि वे लौट गए/पीछे हट गए (यानि उनकी हिम्मत टूट गई)। श्रवन सुजसु सुनि मोर — “श्रवन” = सुनना; “सुजसु” = कीर्ति अर्थात रावण समझ रहे हैं कि उनकी कीर्ति के बारे में सुनकर राम, बानर सेना को लेकर वापस लौट गए। कहसि न रिपु दल तेज बल — गुप्तचर शत्रु-दल की तेज-बल (शक्ति, पराक्रम) का कोई विवरण नहीं दे रहा है। बहुत चकित चित तोर — वे बहुत ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (353-360)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 352-360 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई — तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।। कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।। बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।। पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।। करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।। पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।। जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।। कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।। भावार्थ : रावण के दूत (गुप्तचर)लंकापति रावण के दरबार में पहुँचते हैं। वे पहले लक्ष्मणजी के चरणों में प्रणाम करके श्रीराम के गुणों का गान करते हुए लंका आते हैं। वहाँ पहुँचकर रावण के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं। रावण हँसते हुए उनसे विभीषण के बारे में पूछता है और कहता उसकी मृत्यु निकट आ गई है, वरना लंका राज्य को छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में नहीं जाता। जिस तरह कीट पतंग की मृत्यु आती है। फिर वह कहता है — “भालू और वानरों की सेना के बारे में बताओ जो कठिन काल से प्रेरित होकर यहां आया है, जिसका रखवाला समुद्र से...

सुन्दर काण्ड दोहा (52)

 सुन्दर काण्ड दोहा 52 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम सन्देसु उदार। सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।  शब्दार्थ – मुखागर – मुँह से कहा हुआ, स्पष्ट रूप से बोला हुआ। मूढ़ सन – मूर्ख (यहाँ रावण से)। सन्देसु उदार – उदार (दयालु) सन्देश। देइ – देकर। मिलेहु – मिलना, मिलो। आवा काल तुम्हार – तुम्हारा अन्त समय आ पहुँचा है। भावार्थ –  लक्ष्मण जी ने रावण के गुप्तचरों को पत्र लिखकर दिया और कहा कि रावण से जाकर कह दो कि वह सीता जी को सम्मानपूर्वक लौटा दे। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो समझ लेना कि अब उसका अन्त काल निकट आ गया है। विस्तृत विवेचन – इस दोहे में लक्ष्मण की असीम करुणा और धर्मनिष्ठा प्रकट होती है। वे रावण जैसे पापी को भी बिना युद्ध के सुधारने का अवसर दे रहे हैं। लक्ष्मण जी द्वारा यह संदेश “उदार सन्देश” है, क्योंकि यह क्षमा और नीति दोनों का संगम है। यदि रावण सीता जी को लौटा देता है तो विनाश से बच सकता है, परंतु यदि अहंकार में अड़ा रहेगा, तो उसका नाश निश्चित है। यहाँ “आवा काल तुम्हार” यह भविष्यवाणी रूपी वाक्य झलकता है कि रावण का अंत निकट है।

सुन्दर काण्ड चौपाई (345-352)

  सुन्दर काण्ड चौपाई 345-352 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।। रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।। कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।। सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।। बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।। जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।। सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।। रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।। भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: रावण के गुप्तचरों नें राम और विभीषण के प्रसंग को देखकर राम की सराहना करने में अपना भेद भूल गया और सभी बानर यह जानकर उसे बांध दिया। सुग्रीव ने उसे अंग भोगकर भेजने का आदेश दिया। सभी बानर उसे मारने लगे। तब लक्ष्मण जी उन्हें दयापूर्वक छुड़ा दिया। उन्होंने उस दूत पत्र दिया और रावण को दिखाने के लिए कहा। फिर लक्ष्मणजी ने कहा — "रावण को यह पाती (संदेश) दे देना कि वह कुलघाती है, श्रीराम से वैर न करे।" सारांश: यह दिखाता है कि राम की शरण में जाने पर वे बड़े से बड़े शत्रु को भी माफ कर देते...

सुन्दर काण्ड दोहा (51)

  दोहा – सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।। भावार्थ विभीषण के लंका से राम के पास आने के बाद रावण ने अपने गुप्तचर को भेजा था जो  बंदर का वेश धारण कर कपट रूप में था । उन्होंने प्रभु के द्वारा विभीषण की शरणागति को देखकर सच्चे हृदय से सराहना की। विस्तृत विवेचन: इस दोहे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम के शरणागत-वत्सल स्वभाव का सुंदर चित्रण किया है। 1. “सकल चरित तिन्ह देखे”— रावण के गुप्तचरों ने राम के द्वारा विभीषण की शरणागति को अपनी आंखों से देखा। 2. “धरें कपट कपि देह”— रावण के गुप्तचरों ने बानर का कपट वेश धारण कर रखा था। 3. “प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं”— गुप्तचरों ने सच्चे हृदय से भगवान राम की सराहना की। श्रीराम का यह गुण है कि वे शरणागत की रक्षा अवश्य करते हैं। उनका हृदय करुणा से भर जाता है जब कोई भी जीव सच्चे मन से उनकी शरण में आता है। 4. “सरनागत पर नेह”— यह पंक्ति भगवान के प्रेम और दया का सार है। चाहे कोई कितना भी दोषी क्यों न हो, यदि वह सच्चे हृदय से प्रभु की शरण ग्रहण करे, तो प्रभु उसे अपने हृदय से लगाते हैं। निष्कर्ष: इस ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (337-344)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 337-344 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।। मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।। नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।। कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।। सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।। अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।। प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।। जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।। भावार्थ: विभीषण जी के सुझाव पर राम जी ने कहा — “हे सखा! उपाय तो तुम्हारा बहुत अच्छा है" भगवान श्री राम को यह मत अच्छा लगा। पर यह विचार लक्ष्मण जी को पसंद नहीं आया कि यदि दैव (भाग्य) सहायता करे तो ही यह कार्य सफल होगा।” उन्होंने कहा — “दैव के भरोसे कुछ नहीं होता, पुरुष को अपने कर्म पर विश्वास रखना चाहिए। जो व्यक्ति हर बात में ‘दैव-दैव’ कहकर बैठा रहता है, वह आलसी होता है।” राम जी ने लछ्मण को समझाया कि “धैर्य रखो, हम प्रयत्न करेंगे।” इतना कहकर वे समुद्र तट पर गए, पहले सिर झुकाकर प्रणाम किया और कुशा बिछाकर बैठ गए। जब विभीषण जी भगव...

सुन्दर काण्ड दोहा (50)

 सुन्दर काण्ड दोहा 50 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।। भावार्थ : विभीषण जी भगवान श्रीराम से कहते हैं — "प्रभु! समुद्र आपके कुलगुरु (पूर्वजों के गुरु) हैं, वे विचार करके स्वयं ही कोई उपाय बताएंगे। तब बिना अधिक प्रयास के, सभी वानर और भालू सेना सहित आप समुद्र पार कर सकेंगे।" विस्तृत विवेचन : इस दोहे में विभीषण जी का सौम्य, विनम्र और विवेकपूर्ण स्वभाव प्रकट होता है। जब समुद्र पार करने का उपाय खोजा जा रहा था, तब विभीषण भगवान श्रीराम को सलाह देते हैं कि — सागर आपके कुलगुरु (पूर्वजों के गुरु) हैं, क्योंकि सगर के पुत्रों ने सागर का निर्माण किया था, इसलिए सागर आपका कुल संबंधी हुआ। इस नाते वे अवश्य ही आपकी प्रार्थना का मान रखेंगे और उचित उपाय बताएंगे जिससे वानर-भालु सेना को कष्ट न हो। यहाँ विभीषण जी यह भी संकेत करते हैं कि — विनम्रता और धर्मयुक्त संवाद बल प्रयोग से श्रेष्ठ है। प्रभु का कार्य भले ही पराक्रम से सिद्ध हो, परंतु विनय और नीति का स्थान सर्वोपरि है। सारांश : यह दोहा विनम्रता, विव...

सुन्दर काण्ड चौपाई (329-336)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 329-336 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे: अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।। निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।। पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।। बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।। सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।। संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।। कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।। जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।। भावार्थ जो लोग प्रभु श्रीराम को छोड़कर अन्य देवताओं की भक्ति करते हैं, वे मनुष्य होकर भी बिना पूँछ और सींग के पशु के समान हैं। भगवान श्रीराम ने विभीषण को अपना जन (भक्त) मानकर स्नेहपूर्वक अपनाया। प्रभु सर्वज्ञ हैं, सबके हृदय में निवास करते हैं, सब रूपों में व्याप्त होकर भी उनसे रहित और निष्पृह हैं। श्रीराम नीति के पालन करने वाले हैं और दुष्ट राक्षसों के संहार के लिए ही मानव रूप में अवतरित हुए हैं। वे कपिराज सुग्रीव और विभीषण से कहते हैं—“अब बताओ इस गहरे और भयानक समुद्र को किस उपाय से पार किया जाए?” यह समुद्र मग...

सुन्दर काण्ड दोहा (49)

 सुन्दर काण्ड दोहा 49 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।। जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।। भावार्थ पहला पैरा (49क) — रावण का क्रोध अग्नि जैसा तीव्र है और उसके श्वास (स्वास) में भी धरती हिला देने वाली हवा सी प्रचंडता है। बिभीषण जलते—झुलसते (दुःख/भय से) हुआ भी था, पर रघुनाथ ने उसे सम्पूर्ण (अखण्ड) सुरक्षित रखा। दूसरा पैरा (49ख) — वही संपत्ति और बल जो शिव ने रावण को दिये थे (दस माथे वगैरह के रूप में शक्ति/वैभव), वही रघुनाथ ने (बिन झिझक) बिभीषण को दे दिया — यानी राम ने उसे सम्मान, अधिकार और सुरक्षा दे दी। विस्तृत विवेचन 1. प्रतीकात्मक चित्रण — रावण बनाम राम: यहाँ रावण की हिंसक प्रवृत्ति को अग्नि और उस अग्नि में फूँकने वाली प्रचंड हवा से बताया गया है — यह दर्शाता है कि रावण का क्रोध विनाशकारी और नियंत्रित नहीं था। इसके उलट राम की छवि संरक्षणकर्ता और क्षमाशील नेता की है जो संकट में पड़ी आत्मा को संजोकर रखता है। 2. बिभीषण की दशा — “जरत” शब्द से बिभीषण क...

सुन्दर काण्ड चौपाई (319-328)

  सुन्दर काण्ड चौपाई 319-328 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।। राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।। सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।। पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।। सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।। उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।। अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।। एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।। जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।। अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।। यह चौपाई “सुन्दरकाण्ड” में आती है, जहाँ भगवान श्रीराम और विभीषण के बीच अत्यंत भावनात्मक संवाद होता है। आइए पहले इसका भावार्थ और फिर विस्तृत विवेचन समझते हैं — भावार्थ: श्रीराम कहते हैं — “हे लंकेश (विभीषण)! तुममें सब उत्तम गुण हैं, इसलिए तुम मुझे बहुत प्रिय हो।“ यह सुनकर सब वानर ‘जय-जय’ बोलने लगे। विभीषण श्रीराम के वचनों को अमृत के समान पाकर बार-बार उनके चरणों में झुकते हैं, किंतु उनके हृदय में जो पहले...

सुन्दर काण्ड दोहा (48)

 सुन्दर काण्ड दोहा 48 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – 48 सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।। भावार्थ: भगवान श्रीराम कहते हैं — जो मनुष्य सगुण रूप में मेरी उपासना करते हैं, दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति (धर्म) में दृढ़ हैं और नियमों का पालन करते हैं, और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है — वे मेरे लिए प्राण के समान प्रिय हैं। विस्तृत विवेचन: यह दोहा भगवान श्रीराम की भक्त-प्रियता और सद्गुणों के प्रति सम्मान को दर्शाता है। 1. सगुण उपासक: जो भक्त भगवान के साकार रूप — जैसे राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि — की प्रेमपूर्वक उपासना करते हैं, वे सगुण भक्त कहलाते हैं। ऐसे भक्त भक्ति के साथ-साथ धर्म और समाज की मर्यादा का भी पालन करते हैं। 2. परहित निरत: ये भक्त केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण में सदैव लगे रहते हैं। उनके जीवन का उद्देश्य लोक-कल्याण होता है। 3. नीति दृढ़ नेम: वे धर्म, सत्य, और मर्यादा के नियमों का कठोरता से पालन करते हैं। किसी भी परिस्थिति में नीति से विचलित नहीं होते। 4. द्विज पद प्रेम: जो व्यक्ति ब्राह्म...

सुन्दर काण्ड चौपाई (311-318)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 311-318 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।। जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।। तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।। जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।। सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।। समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।। अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।। तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।। यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में तब आती है जब भगवान श्रीराम विभीषण जी से कहते हैं कि — जो भी जीव (चाहे कितना भी पापी या द्रोही क्यों न हो) यदि मेरे शरण में आ जाता है, तो मैं उसे अपने समान मानता हूँ। अब विस्तार से समझिए 👇 भावार्थ (सरल अर्थ): हे सखा (विभीषण जी)! मेरा स्वभाव सुनो — जैसा कि काकभुशुण्डि, भगवान शंकर और पार्वती जी जानते हैं — यदि कोई मनुष्य, जो पहले सबका शत्रु रहा हो, मेरे शरण में भयभीत होकर आ जाए, और अहंकार, मोह, कपट आदि छोड़ दे, तो मैं उसी क्षण उसे साधु के समान मान लेता हूँ। जो व्यक्ति माता-पिता, भाई, पत्नी, पु...

सुन्दर काण्ड दोहा (47)

 सुन्दर काण्ड दोहा 47 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज। देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।। भावार्थ : विभीषण जी अत्यंत प्रसन्न होकर कहते हैं — “अहो! मेरा तो अपरंपार सौभाग्य है कि श्रीरामचन्द्रजी की असीम कृपा से मेरे नेत्रों को वे कमल के समान चरण देखने का अवसर मिला, जिनकी पूजा स्वयं ब्रह्मा और शंकर भी करते हैं।” अर्थात विभीषण जी को अपने भाग्य पर गर्व है कि उन्होंने उन चरणों का दर्शन किया, जो समस्त देवताओं के वंदनीय हैं। विस्तृत विवेचन : यह दोहा सुन्दरकाण्ड में तब आता है जब विभीषण जी रावण और लंका को छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में आते हैं और प्रभु श्रीराम के चरणों का दर्शन करते हैं। इस दोहे में विभीषण की भक्ति, विनम्रता और आनंद का अद्भुत चित्रण है। 1. भक्ति और विनम्रता का भाव: विभीषण जी अपने कार्य की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि यह मानते हैं कि सब कुछ प्रभु श्रीराम की कृपा से ही संभव हुआ। वे अपने सौभाग्य को श्रीराम की कृपा का परिणाम बताते हैं। 2. भगवद् चरणों की महिमा: श्रीराम के चरण स्वयं ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) और शिव (संहारक) तक के प...

सुन्दर काण्ड चौपाई (304-310)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 304-310 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: ❖ चौपाई 1: "तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।" ➤ भावार्थ: जब तक श्रीराम हृदय में निवास नहीं करते, तब तक हृदय में तरह-तरह के दुष्ट (बुरे) विकार रहते हैं — जैसे लोभ, मोह, मद (अहंकार), माना (आत्मगौरव/गर्व)। ये सब हृदय को मलिन और दूषित करते हैं। ➤ विवेचन: विभीषण जी कह रहे हैं कि जब तक भगवान का सच्चा निवास हृदय में नहीं होता, तब तक मनुष्य का हृदय बुरे गुणों से भरा रहता है। लोभ (लालच), मोह (आसक्ति), मद (अहंकार), और माना (स्वयं को श्रेष्ठ मानना) – ये सभी आत्मा को कलुषित कर देते हैं। यह विभीषण जी की आध्यात्मिक दृष्टि है जो आत्मा की शुद्धता में प्रभु की उपस्थिति को अनिवार्य मानती है। ❖ चौपाई 2: "जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।" ➤ भावार्थ: जब तक हृदय में वह रघुनाथ (श्रीराम) नहीं बसते, जो धनुष-बाण और तरकश धारण किए रहते हैं (अर्थात जो संसार के अनाचार का संहार करते हैं), तब तक हृदय पवित्र नहीं हो सकता। ➤ विवेचन: यहाँ श्रीराम को एक संहारकर्ता रूप में प्रस्तुत किया गया है — जो अधर्म का ना...

सुन्दर काण्ड दोहा (46)

 सुन्दर काण्ड दोहा 46 का भावार्थ सहित विस्तृत  विवेचन: दोहा – “तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।” भावार्थ : जब तक कोई जीव (मनुष्य) भगवान श्रीराम का भजन नहीं करता, तब तक वह सुख और शांति नहीं पा सकता। उसके जीवन में दुःख, चिंता और अशांति ही रहती है। केवल श्रीराम के भजन और भक्ति से ही मन को सच्चा विश्राम और आनंद प्राप्त होता है। विस्तृत विवेचन : इस दोहे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान राम की भक्ति की महिमा का सुंदर वर्णन किया है। वे कहते हैं कि— जब तक जीव सांसारिक कार्यों, वासनाओं और विषयों में लिप्त रहता है, तब तक उसे कभी भी वास्तविक सुख नहीं मिलता। संसार के सभी सुख अस्थायी हैं, और उनका अंत दुःख में ही होता है। लेकिन जैसे ही मनुष्य भगवान श्रीराम का भजन करने लगता है, उसके जीवन से भय, दुःख और मोह मिट जाते हैं, और उसे परम शांति की प्राप्ति होती है। अर्थात्, श्रीराम की भक्ति ही सच्चे सुख, शांति और मोक्ष का द्वार है। निष्कर्ष : मनुष्य को सांसारिक मोह-माया त्यागकर भगवान श्रीराम की शरण में जाना चाहिए, तभी जीवन में वास्तविक सुख और शा...

सुन्दर काण्ड चौपाई (296-303)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 296-303 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।। दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।। अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।। कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।। खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।। मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।। बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।। अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ।। भावार्थ : जब विभीषण जी ने प्रभु श्रीराम को प्रणाम किया, तब प्रभु अत्यंत प्रसन्न होकर उठे और उन्होंने अपने विशाल भुजाओं में उन्हें भर लिया। प्रभु ने उन्हें लक्ष्मण सहित पास बैठाया और प्रेमपूर्वक पूछा — “हे लंकेश! तुम और तुम्हारा परिवार कुशल तो हैं? तुम तो राक्षसों की सभा में रहते हो, वहाँ धर्मपालन कैसे संभव है?” श्रीराम आगे कहते हैं कि — “मैं तुम्हारा स्वभाव जानता हूँ, तुम नीति में निपुण और न्यायप्रिय हो, परंतु दुष्टों की संगति से कभी कल्याण नहीं होता। नरक में रहना भी अच्छा है, पर दुष्टों का साथ नहीं ह...

सुन्दर काण्ड दोहा (45)

 सुन्दर काण्ड दोहा 45 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।। जब विभीषण जी भगवान राम से मिले तब उन्होंने भगवान राम से कहा  भावार्थ हे प्रभु! आपके सुंदर यश और गुणों को सुनकर मैं आपके चरणों में आया हूँ। आप तो संसार-रूपी भय का नाश करने वाले हैं। मेरी "त्राहि-त्राहि" (रक्षा की पुकार) सुनकर मेरी सारी विपत्ति हर लीजिए, क्योंकि आप ही दुखों का हरण करने वाले और शरणागत को सुख देने वाले श्रीरघुनाथ हैं। विस्तृत विवेचन 1. श्रवण सुजसु सुनि आयउँ – विभीषण कहते हैं कि मैंने आपका यश, गुण, और चरित्र सुना। रामचरितमानस में बार-बार यही दिखाया गया है कि भगवान की महिमा सुनकर ही साधक के भीतर श्रद्धा और भक्ति का बीज अंकुरित होता है। 2. भंजन भव भीर – संसार दुःखों और भय से भरा है। यह भवसागर (जन्म-मरण का चक्र) बड़ा कठिन है। श्रीराम "भवभीति" का नाश करने वाले हैं। अतः जब मनुष्य उन पर विश्वास करता है तो उसे निर्भयता और आत्मिक शांति मिलती है। 3. त्राहि त्राहि आरति हरन – यहाँ विभीषण की "हृदय की पुकार" झलकती ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (289-296)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 289-296 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।। दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।। बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।। भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।। सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।। नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।। नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।। सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।। भावार्थ हनुमानजी ने बिभीषण को सम्मानपूर्वक आगे चलने के लिए कहा और वे प्रभु श्रीराम के पास आ पहुँचे। दूर से ही बिभीषण ने राम और लक्ष्मण के दर्शन किए, जिनकी छवि ने उनकी आँखों को आनन्द से भर दिया। राम का सौंदर्य देखकर वे ठिठककर क्षणभर एकटक निहारते रह गए। उनके लंबे भुजाएँ, लाल कमल जैसे नेत्र, श्याम शरीर और भक्तों के भय का नाश करने वाले स्वरूप देखकर वे मुग्ध हो गए। सिंह के समान चौड़े कंधे, विस्तृत वक्षस्थल और मोहक मुखमंडल ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु उमड़ पड़े और रोम-रोम पुलकित हो उठा। मन को स्थिर करके उ...

सुन्दर काण्ड दोहा (44)

 सुन्दर काण्ड दोहा 44 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – "उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत। जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।" भावार्थ – श्रीराम करुणा के धाम (कृपानिकेत) ने हँसकर कहा – "उसे (विभीषण को) दोनों ही प्रकार से, चाहे मित्र के रूप में या शत्रु के रूप में, ले आओ।" फिर "जय हो कृपालु प्रभु की" ऐसा कहकर अंगद और हनुमान जी समेत सब वानर विभीषण को लेने चल पड़े। विवेचन – 1. इस प्रसंग में विभीषण, जो कि रावण का भाई था, अपने कुल और बंधु-जन छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में आ रहा है। सुग्रीव और अन्य वानरों को आशंका थी कि कहीं वह दूत बनकर छल तो नहीं कर रहा। लेकिन श्रीराम जी करुणा के सागर हैं, वे सबका भला चाहते हैं। इसलिए वे मुस्कराकर कहते हैं – "वह चाहे शत्रु बनकर आया हो या सच्चे भाव से मित्र बनकर आया हो, उसे लाओ।" 2. यहाँ भगवान राम का दिव्य गुण प्रकट होता है – शरणागत वत्सलता। उनका वचन है कि जो कोई भी शरण में आता है, चाहे उसका स्वभाव कैसा भी क्यों न हो, प्रभु उसे स्वीकार करते हैं। यह भक्तों के लिए विश्वास का आधार है कि भगवान से मिलने में किस...