सुन्दर काण्ड दोहा (59)
सुन्दर काण्ड दोहा 59 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो० – सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ। जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।। 59।। शब्दार्थ : सुनत बिनीत बचन – विनम्र वचनों को सुनकर, अति कह कृपाल मुसुकाइ – अत्यंत कृपालु श्रीराम मुस्कुराकर बोले, जेहि बिधि उतरै कपि कटकु – जिस उपाय से वानर सेना पार उतर सके, तात सो कहहु उपाइ – हे तात (सागर), वह उपाय बताओ। भावार्थ : जब सागर ने तीन दिन तक रामजी की प्रार्थना नहीं सुनी, तब श्रीराम क्रोधित होकर उसे सुखाने की बात कहते हैं। लक्ष्मण जी ने उनके आदेश पर धनुष-बाण तैयार कर लिया। उसी समय सागर देव भयभीत होकर प्रकट हुए और अत्यंत विनम्रता से भगवान से क्षमा माँगने लगे। सागर की विनम्र बातों को सुनकर भगवान श्रीराम करुणा से मुस्कुराए और कोमल स्वर में बोले — “हे तात! अब तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे यह वानर सेना समुद्र पार उतर सके।” विस्तृत विवेचन : यह दोहा भगवान श्रीराम की करुणा और क्षमाशीलता को प्रकट करता है। तीन दिन की प्रतीक्षा और सागर के मौन के बाद भी जब भगवान ने क्रोध दिखाया, तो वह धर्म की रक्षा हेतु था, न कि अहंकारवश। परंतु जैसे ही सागर न...