सुन्दर काण्ड दोहा (48)
सुन्दर काण्ड दोहा 48 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा – 48
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।
भावार्थ:
भगवान श्रीराम कहते हैं — जो मनुष्य सगुण रूप में मेरी उपासना करते हैं, दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति (धर्म) में दृढ़ हैं और नियमों का पालन करते हैं, और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है — वे मेरे लिए प्राण के समान प्रिय हैं।
विस्तृत विवेचन:
यह दोहा भगवान श्रीराम की भक्त-प्रियता और सद्गुणों के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
1. सगुण उपासक:
जो भक्त भगवान के साकार रूप — जैसे राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि — की प्रेमपूर्वक उपासना करते हैं, वे सगुण भक्त कहलाते हैं। ऐसे भक्त भक्ति के साथ-साथ धर्म और समाज की मर्यादा का भी पालन करते हैं।
2. परहित निरत:
ये भक्त केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण में सदैव लगे रहते हैं। उनके जीवन का उद्देश्य लोक-कल्याण होता है।
3. नीति दृढ़ नेम:
वे धर्म, सत्य, और मर्यादा के नियमों का कठोरता से पालन करते हैं। किसी भी परिस्थिति में नीति से विचलित नहीं होते।
4. द्विज पद प्रेम:
जो व्यक्ति ब्राह्मणों (अर्थात् ज्ञान और धर्म के उपासक) का आदर करता है और उनके चरणों में प्रेम रखता है, वही वास्तव में विनम्र और भक्त होता है
अंत में श्रीराम कहते हैं कि — ऐसे भक्त मेरे लिए प्राणों के समान प्रिय हैं। भगवान के लिए भक्ति, परोपकार, और नीति-पालन ही सबसे बड़ा धर्म है।
संक्षेप में:
👉 सगुण भक्ति, परोपकार, धर्मपालन और द्विज-सेवा — यही भगवान राम के प्रिय गुण हैं।
👉 ऐसे व्यक्ति भगवान के लिए स्वयं प्राणों से भी बढ़कर होते हैं।
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