सुन्दर काण्ड चौपाई (281-288)
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में आती है, जहाँ प्रभु श्रीराम, विभीषण के शरणागत होने पर, अपने आदर्श शरणागतवत्सल भाव का परिचय देते हैं। आइए पहले इसका भावार्थ और फिर विस्तृत विवेचन देखें: चौपाई कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।। सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।। पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।। जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।। निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।। जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।। जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।। भावार्थ श्रीराम कहते हैं— यदि कोई मनुष्य करोड़ों ब्राह्मणों का वध करके भी मेरे पास शरण लेने आए, तो भी मैं उसे कभी नहीं त्यागता। जब कोई जीव मेरे सामने आता है, उसी क्षण उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। पापी का स्वभाव चाहे जैसा हो, पर यदि वह मेरी ओर भाव से आए, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ। निष्कपट, निर्मल हृदय वाला भक्त ही मुझे पाता है; कपट और छल मुझे नहीं भाते। यदि रावण ने विभीषण को केवल कपट से भ...