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Showing posts from September, 2025

सुन्दर काण्ड चौपाई (281-288)

 यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में आती है, जहाँ प्रभु श्रीराम, विभीषण के शरणागत होने पर, अपने आदर्श शरणागतवत्सल भाव का परिचय देते हैं। आइए पहले इसका भावार्थ और फिर विस्तृत विवेचन देखें: चौपाई कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।। सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।। पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।। जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।। निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।। जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।। जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।। भावार्थ श्रीराम कहते हैं— यदि कोई मनुष्य करोड़ों ब्राह्मणों का वध करके भी मेरे पास शरण लेने आए, तो भी मैं उसे कभी नहीं त्यागता। जब कोई जीव मेरे सामने आता है, उसी क्षण उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। पापी का स्वभाव चाहे जैसा हो, पर यदि वह मेरी ओर भाव से आए, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ। निष्कपट, निर्मल हृदय वाला भक्त ही मुझे पाता है; कपट और छल मुझे नहीं भाते। यदि रावण ने विभीषण को केवल कपट से भ...

सुन्दर काण्ड दोहा (43)

 सुन्दर काण्ड दोहा 43 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।। भावार्थ जो लोग किसी शरणागत (शरण लेने वाले) को यह सोचकर त्याग देते हैं कि यह हमारे लिए अनिष्टकारी होगा, वे मनुष्य पाप से भरे हुए नीच कहलाते हैं। ऐसे लोगों की ओर देखना भी हानिकारक है। विस्तृत विवेचन यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान राम की शरणागत वत्सलता (शरण लेने वाले की रक्षा करना) का महत्व बताया है। 1. शरणागत की रक्षा का धर्म – भारतीय संस्कृति में यह सिद्धांत है कि जो शरण में आ जाए, उसका रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है, चाहे वह मित्र हो या शत्रु। श्रीराम ने स्वयं विभीषण को शरण दी, भले ही वे रावण के भाई थे। 2. त्याग करने वालों की निंदा – जो लोग अपने स्वार्थ और भयवश शरणागत का त्याग करते हैं, वे वास्तव में अधम और पापमय कहलाते हैं। ऐसे व्यक्तियों का संग और दर्शन तक अहितकारी माना गया है, क्योंकि वे धर्मविहीन होते हैं 3. राम का आदर्श – श्रीराम ने यह शिक्षा दी कि सच्चा धर्म वही है, जिसमें शरणागत की रक्षा हो। उनका यह चरित्र मानव समाज को करुणा, क्षमा ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (272-280)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 272-280 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।। कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।। ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।। कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।। कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।। जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।। भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।। सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।। सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।  यह चौपाई सुन्दर काण्ड की है, जिसमें विभीषण का भगवान राम की शरण में आना और सुग्रीव का संदेह प्रकट करना वर्णित है। चौपाई एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।। कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।। ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।। कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।। कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।। जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।। भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।। सखा नीति तुम्ह नीकि बिच...

सुन्दर काण्ड दोहा (42)

 सुन्दर काण्ड दोहा 42 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।। यह दोहा उस समय की है, जब विभीषण जी ने रावण को समझाने की कोशिश की। रावण ने उन पर चरण से प्रहार किया और वे लंका छोड़कर भगवान राम की शरण में जाना स्वीकार किया। भावार्थ जिन पांवों की पादुकाएँ भरत ने अपने मन में संजोकर रखी थीं (यानी जिनका भरत को अत्यन्त लगाव और श्रद्धा थी), आज मैं उन्हीं पांवों को देख रहा/रही हूँ; अब मेरे नयन (आँखें) उन्हीं पर टिक कर संतुष्ट/विराम पाएँगी — यानी दर्शन से मन/आत्मा को परम तृप्ति मिल गई है। विस्तृत विवेचन 1. संदर्भ (भरत और पादुका) भरत ने रघु-रवरीश्वर (राम) की पादुकाएँ लेकर उन्हें सिंहासन पर रख दिया और स्वयं सिंहासन पर बैठने से इन्कार कर दिया — पादुकाें से ही राम का प्रतिनिधित्व और अधिकार बना रहा। पादुका यहाँ सिर्फ जूता नहीं, बल्कि राम-सान्निध्य और राजधर्म का प्रतीक है। इस दोहे में वही भावना — भरत की भक्ति से जुड़ा आदर और और भक्त की दीर्घकामना — सामने आती है। 2. भावनात्मक/आध्यात्मिक अर्थ “ते पद आजु बिलोकिहउँ” — व...

सुन्दर काण्ड चौपाई (364-371)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 364-371 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे: चौपाई "अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।। साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।। रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।। चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।। देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।। जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।। जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।। हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिह उँ तेई।।" भावार्थ जब विभीषण ने उचित नीति कहकर रावण को समझाया और वह उनकी बात न मानकर उन्हें अपमानित कर निकाल दिया, तब विभीषण वहाँ से श्रीराम की शरण में जाने के लिए प्रसन्न होकर चल पड़े। साधु की अवज्ञा होते ही दुष्ट का सर्वनाश निश्चित हो जाता है। रावण ने जब विभीषण को त्याग दिया, तभी उसका ऐश्वर्य, वैभव और आयु सब क्षीण हो गया। विभीषण मन ही मन हर्षित होकर यह सोचने लगे कि अब मुझे प्रभु श्रीराम के चरण-कमल देखने और उनकी सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यही चरण हैं जिन्होंने ऋषि-पत्नी अहल्या को तार दिया, दण्डकवन को पवित्र किया, सीता जी को...

सुन्दर काण्ड दोहा (41)

 सुन्दर काण्ड दोहा 41 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।। भावार्थ हे प्रभु! श्रीराम सत्यसंकल्प वाले हैं, उनकी आज्ञा और इच्छा कभी व्यर्थ नहीं जाती। हे लंकेश! यह सभा काल (मृत्यु) के वश होकर नीति के विपरीत कार्य कर रही है। अब आप मुझे विलंब किए बिना श्रीरामचन्द्रजी की शरण जाने की अनुमति दें। विस्तृत विवेचन 1. सत्यसंकल्प प्रभु श्रीराम – यहाँ विभीषण रावण को समझाते हैं कि श्रीराम केवल एक राजा या मनुष्य नहीं, बल्कि सत्यसंकल्प वाले परमेश्वर हैं। उनकी इच्छा ही सत्य है, उनके संकल्प में कभी असत्य या असफलता नहीं होती। इसका अर्थ यह है कि युद्ध का परिणाम पहले ही निश्चित है – श्रीराम की विजय और रावण का पतन। 2. सभा कालबस तोरि – विभीषण कहते हैं कि यह सभा (रावण की मंत्रिपरिषद्) काल के वश होकर चल रही है। यहाँ ‘कालबस’ का अर्थ है मृत्यु के अधीन। जब किसी का अंत निकट होता है, तो उसकी बुद्धि विपरीत दिशा में चलती है। यही कारण है कि सारे मंत्री सत्य और नीति की बातें नहीं मान रहे, बल्कि रावण को विनाश की ओर ढकेल रहे हैं। 3. रघुबीर...

सुन्दर काण्ड चौपाई (355-363)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 355-363 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।। सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।। जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।। कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।। मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।। अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।। उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।। तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।। सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।। यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में आती है, जहाँ विभीषण ने रावण को बार-बार नीति और धर्म का उपदेश दिया, परंतु रावण अपने अहंकार और क्रोध के कारण उसे अस्वीकार कर देता है। आइए भावार्थ और विस्तृत विवेचन देखें— चौपाई बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।। सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।। भावार्थ – विभीषण ने शास्त्र, वेद और पुराण-सम्मत धर्म और नीति की बातें कहीं। परंतु उन्हें सुनकर रावण क्रोध से भर उठा और बोला – "हे मूर्ख! तेरे पास मृ...

सुन्दर काण्ड दोहा (40)

 सुन्दर काण्ड दोहा 40 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।। भावार्थ हे भाई (रावण)! मैं आपके चरण पकड़कर विनती करता हूँ। आप माता सीता को श्रीराम को लौटा दें। इससे आपका कोई अहित नहीं होगा, बल्कि कल्याण ही होगा। विस्तृत विवेचन यह दोहा सुन्दरकाण्ड में उस समय का है जब विभीषण ने रावण को नीति और धर्म का उपदेश दिया। 1. विभीषण की विनम्रता और भाईचारा विभीषण ने रावण को क्रोध या कठोरता से नहीं, बल्कि अत्यंत विनम्र और भाईचारे से समझाने का प्रयास किया। उन्होंने "तात" (पिता समान भाई) कहकर रावण को सम्बोधित किया और चरण पकड़कर दुलार से बात कही। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म की बात भी जब कोमलता से कही जाती है तो उसका प्रभाव गहरा होता है। 2. सीता-हरण के दुष्परिणाम से बचाव विभीषण ने कहा कि यदि आप सीता जी को रामचंद्रजी को लौटा दें तो इससे आपका कोई नुकसान नहीं होगा। बल्कि राम जी की कृपा प्राप्त होगी और आपके कुल, राज्य और प्राण सब सुरक्षित रहेंगे। यदि ऐसा न किया गया तो अनर्थ निश्चित है क्योंकि भगवान श्रीराम के विरुद्ध चलना ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (348-354)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 348-354 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।। तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।। रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।। माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।। सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।। जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।। तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।। कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।। भावार्थ माल्यवंत, जो रावण के प्राचीन और बुद्धिमान मंत्री थे, उन्होंने नीति और धर्म की दृष्टि से रावण को उत्तम परामर्श दिया, जिसे सुनकर रावण ने बाहर से तो प्रसन्नता प्रकट की, पर मन में अहंकारवश स्वीकार नहीं किया। बिभीषण ने भी पुनः हाथ जोड़कर समझाया कि पुराण और शास्त्र कहते हैं—हर व्यक्ति के हृदय में सुमति (सद्बुद्धि) और कुमति (दुर्बुद्धि) दोनों रहती हैं। जहाँ सुमति रहती है, वहाँ सुख-समृद्धि आती है; और जहाँ कुमति का वास होता है, वहाँ विनाश और संकट का नाश होता है। लेकिन हे रावण! तेरे हृदय में विपरीत कु...

सुन्दर काण्ड दोहा (39)

 सुन्दर काण्ड दोहा 39 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस। परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।। मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात। तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।। भावार्थ (क) – हे रावण! मैं बार-बार आपके चरण पकड़कर प्रार्थना करता हूँ, आप अभिमान, मोह और मद का त्याग कर श्रीराम का भजन करें। वही अयोध्यापति कोसलाधीश ही सच्चे शरणदाता हैं। (ख) – यह उपदेश मुनि पुलस्ति ने अपने शिष्य से कहकर भेजा था, और वह अवसर पाकर मैं आपको कह रहा हूं। विस्तृत विवेचन 1. रावण को अंतिम चेतावनी यहाँ यह दिखाया गया है कि श्रीराम को केवल पराजित करना ही उद्देश्य नहीं है, बल्कि बार-बार अवसर दिया गया कि वह अपना अहंकार छोड़ दे। "बार-बार पद लागउँ" का अर्थ है – बार-बार नम्रता से समझाया गया। यह दैवी नीति है कि दुष्ट को भी सुधरने का अंतिम अवसर मिलता है। 2. मान, मोह और मद का त्याग मान (अभिमान) – स्वयं को सबसे बड़ा मानना। मोह – विषयवासना और आसक्ति। मद – शक्ति और ऐश्वर्य का गर्व। यही तीनों रावण के पतन का कारण बने। विभीषण जी संकेत करते हैं कि यदि ये त्याग दिए...

सुन्दर काण्ड चौपाई (340-347)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 340-347 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।। ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।। गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।। जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।। ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।। देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।। सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।। जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।। भावार्थ हे भाई रावण! श्रीराम कोई साधारण नर-राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी हैं और काल के भी काल हैं। वे अजन्मा, अनश्वर, अनादि, अनंत, सर्वव्यापक और अजेय ब्रह्मस्वरूप परमात्मा हैं। वे गो, ब्राह्मण, देवता और धरती की रक्षा के लिए करुणा-सागर होकर मानव रूप में अवतीर्ण हुए हैं। वे सज्जनों के आनंददाता और दुष्टों के संहारक हैं। वेद और धर्म की रक्षा के लिए ही वे प्रकट हुए हैं। इसलिए हे भ्राता! उनके विरोध को छोड़कर उनके चरणों में सिर नवाओ। वे शरणागत का कभी त्याग नहीं करते। उनके नाम मात्र से त्रिविध...

सुन्दर काण्ड दोहा (38)

 सुन्दर काण्ड दोहा 38 का भावार्थ सहित विस्तृत  विवेचन: दो0 — काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।। भावार्थ हे प्रभु! काम, क्रोध, मद और लोभ सब नरक को ले जाने वाले मार्ग हैं। इन्हें त्यागकर केवल रघुनाथ श्रीरामजी की भक्ति करो। जिन्हें संतजन भजते हैं, वही मार्ग कल्याणकारी है। विस्तृत विवेचन 1. चार विकार – नरक का द्वार तुलसीदासजी ने यहाँ चार प्रमुख दोषों (काम, क्रोध, मद और लोभ) की चर्चा की है। ये मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। काम (अत्यधिक वासना) मन को चंचल बनाती है। क्रोध विवेक को नष्ट कर देता है। मद (अहंकार) भगवान से और समाज से दूर करता है। लोभ (लालच) संतोष और धर्म का नाश करता है। ये सभी नरक के द्वार हैं, जो आत्मा को बंधन और दुख में डालते हैं। 2. सत्संग और भक्ति का मार्ग इन सबका त्याग करके जो मार्ग अपनाना चाहिए, वह है — श्रीरामभक्ति। संतजन जिस राममय मार्ग को अपनाते हैं, वही सुरक्षित और कल्याणकारी है। संत स्वयं इन विकारों से मुक्त रहते हैं और राम नाम में लीन रहते हैं। उनका आचरण और भक्ति मार्ग साधकों के लिए आदर्श होता है। 3. व्यावहारिक श...

सुन्दर काण्ड चौपाई (332-339)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 332-339 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन : चौपाई: सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।। अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।। पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।। जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।। जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।। सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।। चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।। गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।। भावार्थ जब रावण दरबार में बैठा था, तो उसके मंत्री उसकी प्रसंशा कर रहे थे। उसी समय अवसर पाकर विभीषण, अपने भाई रावण के चरणों में सिर झुकाकर विनम्रता से बैठ गया। उसने आज्ञा पाकर नीति और धर्म की बातें कहते हुए समझाया – हे कृपालु भ्राता! यदि आप मुझसे कुछ पूछते हैं, तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की ही बात कहूँगा। जो अपना कल्याण, यश, सद्बुद्धि, उत्तम गति और सुख चाहते हैं, वे पराई स्त्री को अपनी ललाट पर सुशोभित चंद्रमा की तरह त्याग देते हैं। चौदहों लोकों पर भले ही कोई एकमात्र स्वामी हो, किंतु जो दूसरों की स्त्री का अपम...

सुन्दर काण्ड दोहा (37)

सुन्दर काण्ड दोहा 37 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।। 37।। भावार्थ यदि मंत्री (सचिव), वैद्य (डॉक्टर) और गुरु (आचार्य) डर या लोभवश केवल प्रिय वचन ही बोलते हैं, सच्चाई नहीं बताते, तो राज्य (राजनीति/प्रशासन), धर्म (आध्यात्मिक जीवन/संस्कार), और तन (शरीर/स्वास्थ्य) —ये तीनों शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। विस्तृत विवेचन 1. मंत्री (सचिव): राज्य की नीति और निर्णय मंत्री पर निर्भर करते हैं। यदि मंत्री राजा को केवल वही बातें बताए जो राजा को मीठी लगें, वास्तविकता या संकट न बताए, तो राजा गलत निर्णय लेगा और राज्य नष्ट होगा। 2. वैद्य (डॉक्टर): वैद्य यदि रोगी को केवल अच्छा-अच्छा कहकर खुश करे, परंतु रोग का सही निदान और कठोर इलाज न बताए, तो रोग बढ़ेगा और शरीर का नाश होगा। 3. गुरु (आचार्य): यदि गुरु शिष्य से केवल प्रशंसा की बातें कहे और उसके दोषों का सुधार न करे, तो शिष्य का धर्म और जीवन पथ भ्रष्ट हो जाएगा। 👉 इस प्रकार, भय या स्वार्थवश असत्य बोलने वाले ये तीन वर्ग अपने कर्तव्य से विमुख होकर अनर्थ कर बैठते हैं। यह दोहा आज भ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (323-331)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 323-331 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।। सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।। जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।। कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।। अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।। मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।। बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।। बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।। जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।। चौपाई श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।। मतलब – जब रावण ने यह समाचार सुना तो अभिमान से हँसने लगा। उसका स्वभाव अहंकारपूर्ण था और वह जगत में अभिमानी के रूप में प्रसिद्ध था। सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।। मतलब – मंदोदरी का स्वभाव स्वाभाविक रूप से भययुक्त था (स्त्रियों का स्वभाव भयभीत होने वाला माना गया है)। जहाँ सब मंगल का अवसर है, वहाँ भी उसका मन भय से विचलित हो उठता था। जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।। मतलब – रावण ...

सुन्दर काण्ड दोहा (36)

 सुन्दर काण्ड दोहा 36 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन  दोहा राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक। जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।। भावार्थ श्रीराम के बाण सर्पों के समान हैं और राक्षसों की विशाल सेना मेंढकों के समान है। जैसे ही सर्प मेंढकों को पकड़कर निगलना शुरू करता है, वैसे ही रामबाण राक्षसों को ग्रसते हैं। जब तक सर्प उन्हें पकड़कर खाता नहीं, तब तक मेंढक टर्र-टर्र करते रहते हैं, परंतु एक बार निगल लिए जाने पर उनका कोई उपाय काम नहीं आता। उसी प्रकार राक्षसों को चाहिए कि वे श्रीराम के विरोध का आश्रय छोड़कर जल्दी ही उनके चरणों की शरण ग्रहण करें, अन्यथा रामबाण उन्हें नष्ट कर देंगे। विस्तृत विवेचन 1. रामबाण की महिमा – तुलसीदासजी ने यहाँ रामबाण की तुलना विषधर सर्प से की है। रामबाण जैसे अचूक और प्रचंड अस्त्र राक्षसों का संहार वैसे ही करते हैं, जैसे सर्प सामने आते ही मेंढकों को निगल लेता है। 2. राक्षसों की स्थिति – राक्षसों को ‘भेक’ (मेंढक) कहा गया है। मेंढक तालाब में रहते हुए शोर तो बहुत करते हैं, परंतु सर्प के सम्मुख आते ही उनकी बोलती बंद हो जाती है। इसी प्रकार रावण की सेन...

सुन्दर काण्ड चौपाई (313-322)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 313-322 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।। निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।। जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।। दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।। रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।। कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।। समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।। तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।। तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।। सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।। भावार्थ हनुमानजी द्वारा लंका दहन कर दिए जाने के बाद समस्त राक्षस भयभीत हो जाते हैं। वे आपस में विचार करते हैं कि जिस दूत (हनुमान) के बल का वर्णन भी नहीं किया जा सकता, यदि वह अकेले ही इतनी बड़ी हानि कर सकता है तो सेना आने पर क्या होगा! मंदोदरी यह स्थिति देखकर अत्यंत व्याकुल हो जाती है। वह रावण से नीति-युक्त वाणी में कहती है कि – “हे स्वामी! श्रीराम से वैर छोड़ दीजिए। जिनके दूत की यह शक्ति है, उनके सामने आ...

सुन्दर काण्ड दोहा (35)

 सुन्दर काण्ड दोहा 35 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा "एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर। जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।३५।।" भावार्थ इस प्रकार श्रीराम कृपानिधान अपनी वानर–भालु सेना सहित समुद्र तट पर पहुँचे। वहाँ पहुँचे हुए असंख्य वानर और भालु इधर-उधर फलों को खाने लगे और जहाँ-तहाँ विचरण करने लगे। विस्तृत विवेचन 1. रामजी का सागर तट पर आगमन – लंका विजय की तैयारी हेतु भगवान राम, लक्ष्मण और पूरी वानर-भालु सेना समुद्र के किनारे पहुँचे। यह स्थल ही आगे चलकर रामसेतु निर्माण का केंद्र बना। "कृपानिधि" कहकर तुलसीदासजी ने यह संकेत किया कि प्रभु राम केवल करुणा और दया के भंडार हैं, वे शरणागत वत्सल हैं। 2. सेना का स्वभाव – वानर और भालु विशाल संख्या में समुद्र तट पर पहुँचते ही प्राकृतिक वृत्ति के अनुसार फलों को खाने और यहाँ–वहाँ घूमने लगे। यह चित्रण उनके सहज, सरल और चंचल स्वभाव को दर्शाता है। लेकिन यही वानर आगे चलकर प्रभु के आदेश पर सेतु निर्माण और युद्ध जैसे कठिन कार्यों को भी करते हैं। 3. गूढ़ संकेत – रामकथा यह दिखाती है कि साधारण-से लगने वाले प्राणी जब प्रभु की ...

सुन्दर काण्ड छंद 1-2

 सुन्दर काण्ड छंद 1-2 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।। कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।। सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।। रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।  दिए हुए छन्द सुन्दरकाण्ड में भगवान राम के प्रस्थान और उनके प्रभाव का दिव्य वर्णन किया गया है। आइए पहले भावार्थ देखें, फिर विस्तृत विवेचन करेंगे। ✨ भावार्थ इस छन्द में वर्णन है कि जब प्रभु श्रीराम प्रस्थान करते हैं, तब सम्पूर्ण सृष्टि हर्षित हो उठती है। हाथियों का चक्कराना, पर्वतों का डोलना, समुद्र का उफनना—सब राम की महिमा और प्रभाव को व्यक्त करते हैं। देवता, गंधर्व, मुनि, नाग, किन्नर आदि सबके दुख दूर हो जाते हैं और वे “जय श्रीराम” का गुणगान करने लगते हैं। सर्पराज शेष भी प्रभु के भार से बार-बार मोह में पड़ते हैं, और अपनी दाढ़ों से कठोर कछुए की पीठ को पकड़क...

सुन्दर काण्ड चौपाई (304-312)

सुन्दर काण्ड चौपाई 304-312 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।। देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।। राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।। हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।। जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।। प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।। जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।। चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।। नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।। केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।। यह चौपाई सुन्दरकाण्ड की है, जहाँ श्रीराम की कृपा से वानर-भालुओं की अपार शक्ति प्रकट होती है और युद्ध-यात्रा के लिए उनका प्रस्थान होता है। पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ १. "प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।" वानर और भालु, जिनकी शक्ति अपार है, वे सिर झुकाकर प्रभु श्रीराम के चरणकमलों को प्रणाम करते हैं और गरजते हुए उत्साह प्रकट करते हैं। २. "देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।" श्रीराम ने सम्...

सुन्दर काण्ड दोहा (34)

 सुन्दर काण्ड दोहा 34 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ। नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।। भावार्थ : जब सुग्रीव ने हनुमानजी से यह शुभ समाचार सुना कि माता सीता मिल गई हैं, तो उन्होंने तुरंत ही वानर-सेना को बुलाने का आदेश दिया। तब विभिन्न रंगों, रूपों और अपार बल वाले वानरों और भालुओं के झुंड के झुंड वहाँ आ पहुँचे। विस्तृत विवेचन : 1. सुग्रीव का आदेश : सीता जी का पता लग जाने के बाद श्रीराम का कार्य सिद्ध करने की घड़ी आ गई थी। सुग्रीव ने विलंब न करते हुए तुरन्त अपने सेनापतियों को बुलाकर कहा कि सेना को इकट्ठा किया जाए। यह उनके दायित्व और रामकार्य के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है। 2. सेना का आगमन : वानर और भालुओं के दल अलग-अलग दिशाओं से उमड़ पड़े। इन सबका वर्णन “नाना बरन” से किया गया है, अर्थात् विभिन्न रंगों और रूपों वाले थे – कोई लाल, कोई श्वेत, कोई पीला, कोई काला। 3. शक्ति का वर्णन : तुलसीदास जी लिखते हैं “अतुल बल” – इन वानरों और भालुओं की शक्ति अपार थी, जिसकी तुलना संभव ही नहीं थी। यह सेना संकल्प और उत्साह से भरी हुई थी। 4. धार्मिक संकेत : यह ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (296-303)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 296-303 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।। सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।। उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।। यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।। सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।। तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।। अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।। कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।। यह चौपाई सुन्दरकाण्ड से है। इसमें भगवान राम और हनुमानजी सहित संपूर्ण कपि-सेना का संवाद और रामभक्ति की महिमा वर्णित है। चलिए इसे भावार्थ और विवेचन सहित समझते हैं – चौपाई नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।। सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।। 👉 भावार्थ – हनुमानजी विनम्रता से प्रार्थना करते हैं कि “हे प्रभु! मुझे ऐसी अटल और अखंड भक्ति दीजिए जो अत्यंत सुख देने वाली है और कभी नष्ट न होने वाली है।” भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती (भवानी) कहती हैं कि प्रभु राम का स्वभाव ऐसा है कि जो सरलता से, ...

सुन्दर काण्ड दोहा (33)

 सुन्दर काण्ड दोहा 33 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा “ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल। तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।। ” शब्दार्थ / भावार्थ ता कहुँ = उसके लिए कछु अगम नहिं = कुछ भी असंभव नहीं है जा पर तुम्ह अनुकुल = जिस पर प्रभु की कृपा, अनुकूलता हो तब प्रभावँ = तब उसके प्रभाव से बड़वानलहिं = समुद्र में स्थित अग्नि तूल = रुई जारि सकइ = जला सकती है खलु = निश्चय ही 👉 भावार्थ: जिस जीव पर प्रभु श्रीराम की कृपा हो जाती है, उसके लिए संसार में कुछ भी कठिन या असंभव नहीं रहता। जैसे अग्नि रुई को सहज ही भस्म कर देती है, वैसे ही प्रभु की कृपा से भक्त सब प्रकार के दुष्कर कार्य आसानी से कर लेता है। विस्तृत विवेचन इस दोहे में हनुमान जी ने ईश्वर कृपा की महिमा का वर्णन किया है— 1. भगवद् कृपा से असंभव भी संभव: भक्त चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, लेकिन जब भगवान उसकी ओर अनुकूल हो जाते हैं, तब उसके लिए कोई भी कार्य कठिन नहीं रहता। यह संसार का नियम है कि रुई अग्नि के संपर्क में आते ही तुरंत भस्म हो जाती है। उसी प्रकार प्रभु की कृपा के प्रभाव से सभी बाधाएँ स्वयं ही नष्ट हो...

सुन्दर काण्ड चौपाई (287-295)

सुन्दर काण्ड चौपाई 287-295 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।। प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।। सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।। कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।। कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।। प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।। साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।। नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा। सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।। यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में आती है, जहाँ श्रीराम और हनुमानजी का अत्यंत प्रेमपूर्ण मिलन वर्णित है। चलिए भावार्थ और विस्तृत विवेचन करते हैं— चौपाई बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।। प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।। सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।। भावार्थ भगवान श्रीराम बार-बार हनुमानजी को उठाना चाहते हैं, परंतु हनुमानजी प्रेम में इतने भाव-विभोर हैं कि उठना उन्हें अच्छा नहीं लगता। प्रभु अपने करकमलों से हनुमानजी का सिर...

सुन्दर काण्ड दोहा (32)

 सुन्दर काण्ड दोहा 32 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।। यह दोहा राम जी और हनुमान जी के बातचीत का है, जब सीता माता का समाचार पाकर भगवान राम ने हनुमान जी की प्रशंसा की और कृतज्ञता जताई। भावार्थ प्रभु (श्रीराम) के वचन सुनकर और उनके प्रसन्न मुख को देखकर हनुमान हर्षित हो उठे; प्रेम से आकुल होकर वे प्रभु के चरणों पर गिर पड़े और बार-बार “त्राहि त्राहि — भगवंत” कहकर अपनी लगन/आश्रय की प्रकट प्रार्थना किए।  विस्तृत विवेचन 1. शब्द-आधार (literal): “सुनि प्रभु बचन” = प्रभु के कहे हुए शब्द सुनना; “मुख गात हरषि” = प्रसन्न मुख देखकर हर्ष होना; “चरन परेउ प्रेमाकुल” = प्रेम-उत्स्फूर्त होकर चरणों पर गिर जाना; “त्राहि त्राहि भगवंत” = पहलू-स्वर में भगवतः प्रति पुकार / शरणागत विनती।  2. भावनात्मक स्तर: यहाँ हनुमान का व्यवहार दुःख-निवारण न होकर पूर्ण समर्पण और आनन्द का है — आँसुओं, धड़कन और विकलता से दिखता है कि वह भक्त-प्रेम (भक्ति-राग) में पूर्णतः लीन है। 3. आध्यात्मिक अर्थ: चरणछू करके गिर पड़ना शरण का प...

सुन्दर काण्ड चौपाई (280-286)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 280-286 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।। बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।। कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।। केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।। सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।। प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।। सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।। यह चौपाई वहां की है जहाँ श्रीराम, हनुमानजी को सीता जी के समाचार लाने के बाद अत्यन्त कृतज्ञ होकर अपना हृदय उँडेलते हैं। अब भावार्थ और विवेचन विस्तार से देखिए— चौपाई सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।। बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।। भावार्थ – सीता जी के दुःख का समाचार सुनकर प्रभु श्रीराम, जो स्वयं सुख के सागर और आनंदस्वरूप हैं, उनकी कमल जैसी आँखें आँसुओं से भर गईं। वे कहते हैं—"हे हनुमान! मेरा मन, वाणी और कर्म सब सीता के चरणों में ही लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें यह दुःख क्यों मिला? मुझे तो स्वप्न में भी नहीं समझ आत...

सुन्दर काण्ड दोहा (31)

 सुन्दर काण्ड दोहा 31 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।। यह दोहा उस समय का है जब हनुमान जी राम जी को सीता माता। का संदेश सुनाते हैं और कहते हैं: पद-विश्लेषण निमिष निमिष: पलक झपकने जितना छोटा क्षण, एक-एक पल करुणानिधि: करुणा के महासागर—श्रीराम कल्प सम बीति: कल्प (अत्यन्त दीर्घ काल) के समान बीत रहा है बेगि चलिय: शीघ्र चलिए (हनुमान जी का निवेदन) प्रभु आनिअ: प्रभु (राम) ले आइए भुज बल: भुजाओं का पराक्रम—शौर्य खल दल: दुष्टों की सेना—रावण और राक्षस जीति: जीतकर, पराजित करके भावार्थ हे करुणामय राम! आपके विरह में सीता माता का प्रत्येक क्षण अनन्त काल जैसा लग रहा है। आप शीघ्र चलिए और अपनी भुजाओं के बल से उन दुष्टों की सेना को परास्त कर सीता माता का उद्धार करें। विस्तृत विवेचन 1. विरह की तीव्रता व समय-अनुभूति: “निमिष निमिष… कल्प सम” उपमा से सीता जी का दुःख चरम पर दिखता है—प्रेम में समय का अनुभव बदल जाता है; पलकभर भी युग समान लगता है। यह विप्रलंभ शृंगार और करुण रस का अद्भुत संयोग है। 2. आस्था + कार्य-आग्रह: “बे...

सुन्दर काण्ड चौपाई (271-279)

सुन्दर काण्ड चौपाई 271-279 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।। नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।। अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।। मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।। अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।। नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।। बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।। नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी। सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।। यह चौपाई उस समय का है जब हनुमान जी भगवान राम को सीता माता का संदेश सुनाते हैं: चौपाई चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।। नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।। 👉 भावार्थ – सीता जी ने जाते समय हनुमान जी को अपना चूड़ामणि दिया और कहा कि इसे राम जी को दे देना। यह मेरा विश्वास-चिह्न है। फिर सीता जी ने अश्रुपूरित नेत्रों से कुछ वचन कहे। अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।। मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्...

सुन्दर काण्ड दोहा (30)

 सुन्दर काण्ड दोहा 30 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा (30): "नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।" यह दोहा उस समय का है जब भगवान राम ने हनुमान से सीता माता की कुशलता के बारे में पूछा, तब हनुमान जी ने उसका उत्तर दिया:- शाब्दिक अर्थ नाम पाहरु = प्रभु का नाम ही सीता माता के लिए दिन-रात का कवच है। दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट = दिन-रात राम का ध्यान  सीता माता के हृदय के द्वार पर ताले के समान लगा हुआ है। लोचन निज पद जंत्रित = सीता माता की आँखें राम के चरणों पर बँधी हुई हैं। जाहिं प्रान केहिं बाट = ऐसे में उनके प्राण और मन किसी अन्य मार्ग की ओर जा ही नहीं सकते। भावार्थ इस दोहे में सीता माता की भगवान् के प्रति अनन्य भक्ति को प्रकट किया गया है। भक्त कहता है कि— सीता माता अपने जीवन को प्रभु के नाम-जप रूपी कवच से सुरक्षित कर लिया है। दिन-रात उनके हृदय के द्वार पर राम का ध्यान रूपी ताले लगे रहते हैं। उनकी आँखें राम के चरणों में ही स्थिर हो चुकी हैं। इसलिए उनके प्राण अब किसी अन्य विषय या मोह की ओर कभी जा ही नहीं सकते। यहाँ यह स्पष्ट किय...

सुन्दर काण्ड चौपाई (263-270)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 263-270 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे: चौपाई जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।। ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।। सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।। प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।। नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।। पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।। सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।। कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।। भावार्थ जामवंत जी श्रीराम से कहते हैं— “हे रघुनाथ! जिस पर आपकी कृपा हो जाती है, उसके ऊपर सदा शुभ, मंगल और कल्याण ही रहता है। देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि भी उस पर सदा प्रसन्न रहते हैं। वही सच्चा विजयी, विनयी और गुणों का भंडार है, जिसका यश तीनों लोकों में उज्ज्वल होता है। आपकी कृपा से ही आज सब काम सफल हो गया, और हमारा जीवन सार्थक बन गया। हे प्रभु! पवनपुत्र हनुमान जी ने जो कार्य किया है, उसका वर्णन सहस्त्र मुखों से भी नहीं किया जा सकता। हनुमान जी के पवित्र और अद्भुत चरित्र को जामवंत जी ने आपके समक्ष सुना...