सुन्दर काण्ड चौपाई (377-386)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 377-386 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।

सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।

सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।

मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।

सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।

बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।:

यह चौपाई उस समय की है जब रावण ने अपने गुप्तचरों से राम और उसकी सेना के बारे में बताने को कहा:

चौपाई

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।

सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।

भावार्थ:

श्रीराम का तेज, बल और बुद्धि असीम है; सहस्रमुखी शेषनाग भी उनकी महिमा का वर्णन नहीं कर सकते। वे तो एक बाण से सौ समुद्रों को सुखा सकते हैं, फिर भी उन्होंने मर्यादा और नीति का पालन करते हुए सागर से मार्ग माँगना उचित समझा।

विवेचन:

इससे श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप का परिचय मिलता है। सामर्थ्य होते हुए भी वे नीति और धर्म का पालन करते हैं। यह आदर्श व्यवहार का संदेश देता है — "बलवान व्यक्ति को भी नीति का सम्मान करना चाहिए।"

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।

सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।

भावार्थ:

जब यह समाचार रावण ने सुना कि श्रीराम सागर से मार्ग माँग रहे हैं, तो वह हँसने लगा और कहने लगा — “यदि ऐसी बुद्धि उनके साथ है तो वे कैसे विजयी होंगे?”

विवेचन:

रावण का यह व्यवहार उसकी अहंकारपूर्ण मूर्खता को दिखाता है। उसे श्रीराम की नीति और विनम्रता कमजोरी लगती है, जबकि यही नीति बाद में उसकी विनाश का कारण बनती है।

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।

मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

भावार्थ:

रावण अपने गुप्तचरों के साथ उपहास करता हुआ कहने लगा – “राम तो डरपोक हैं, समुद्र से विनती कर रहे हैं! उनके बल और बुद्धि को मैं अच्छी तरह जानता हूँ।”। तुम व्यर्थ में हीं उसकी बड़ाई कर रहे हो।

विवेचन:

यहाँ तुलसीदासजी यह बताना चाहते हैं कि अहंकारी व्यक्ति सदा नीति को डर समझता है। रावण की यही मूर्खता उसके पतन का कारण बनी।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।

सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।

भावार्थ:

रावण ने कहा कि जिसका मंत्री विभीषण ‌ ही मुझसे भयभीत है उसे युद्ध में विजय कैसे मिल सकती है । रावण की बात सुनकर गुप्तचरों को गुस्सा आ गया और उन्होंने लक्ष्मण द्वारा दिया गया पत्र उन्हें पकड़ा दिया।

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।

बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।

भावार्थ:

गुप्तचरों ने कहा – “हे रावण! यह पत्र श्रीराम के अनुज लक्ष्मण ने दिया है। इसे अपने हृदय से लगाकर पढ़ो।”

रावण ने हँसते हुए उसे बाएँ हाथ से लिया और अपने मंत्री को पढ़ने के लिए कहा।

विवेचन:

रावण का यह व्यवहार उसकी घमंडी प्रवृत्ति दिखाता है। उसने श्रीराम के पत्र को भी आदर नहीं दिया, जिससे यह स्पष्ट है कि उसके विनाश का समय आ चुका था।

🌼 निष्कर्ष (सारांश):

यह सम्पूर्ण प्रसंग यह सिखाता है कि —

👉 शक्ति और नीति दोनों का संग ही

 सच्चा धर्म है।

👉 अहंकार और नीति-अपमान पतन का कारण बनते हैं।


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