सुन्दर काण्ड दोहा (57)

 सुन्दर काण्ड दोहा 57 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

शब्दार्थ –

बिनय – विनम्र निवेदन

जड़ – मूर्ख, हठी

सकोप – क्रोधित होकर

भय बिनु होइ न प्रीति – बिना डर के प्रेम नहीं होता

भावार्थ –

भगवान श्रीराम ने समुद्र से अत्यन्त विनम्रतापूर्वक तीन दिन तक मार्ग देने की प्रार्थना की,

परन्तु वह जड़ (हठी) समुद्र अपनी मर्यादा और हठ छोड़कर भी नहीं माना।

तीन दिन बीत जाने पर श्रीराम को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा —

“जहाँ भय नहीं होता, वहाँ प्रेम भी नहीं टिकता।”

विस्तृत विवेचन –

इस दोहे में भगवान श्रीराम के धैर्य, मर्यादा और न्यायप्रिय स्वभाव का अद्भुत चित्रण है।

उन्होंने पहले समुद्र से शान्तिपूर्वक निवेदन किया कि वानरसेना को लंका पहुँचने के लिए मार्ग दो।

किन्तु समुद्र ने उत्तर नहीं दिया। तीन दिन तक प्रतीक्षा करने के बाद भी जब जलधि नहीं पसीजा,

तो श्रीराम ने यह कहा कि – “मूर्ख और हठी व्यक्ति केवल विनम्रता से नहीं मानते, उन्हें अनुशासन और भय से ही सुधारा जा सकता है।”

इससे यह शिक्षा मिलती है कि –

👉 विनम्रता और नम्र व्यवहार श्रेष्ठ है,

परन्तु जब सामने वाला व्यक्ति हठी या अन्यायी हो,

तो उसे भय या दण्ड का अनुभव कराना भी आवश्यक होता है।



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निष्कर्ष –

श्रीराम का यह कथन जीवन का गूढ़ सिद्धांत बताता है –

जहाँ प्रेम से कार्य न बने, वहाँ मर्यादित कठोरता आवश्यक है।

भय के 

बिना अनुशासन और सच्चा प्रेम टिक नहीं सकता।

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