सुन्दर काण्ड चौपाई (123-132)
सुन्दर काण्ड चौपाई 123-132 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: हरिजनजानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।। बूड़तबिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।। अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।। कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।। सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।। कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।। बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।। देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।। मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।। जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।। भावार्थ (सरल अर्थ): हनुमान को अपना सेवक जानकर माता सीता का प्रेम बहुत बढ़ गया। उनकी आँखें आँसुओं से भर गईं और रोमांच (पुलक) से शरीर काँप उठा। वे कहती हैं—"हनुमान! मैं तो विरह सागर में डूब रही थी, तुम मुझे जलपोत (नाव) की तरह पार लगाने वाले बन गए। अब बताओ, राम और लक्ष्मण कुशल से हैं? मैं तो उन पर बलिहारी जाती हूँ।" "रामजी तो कोमल हृदय और दयालु हैं, फिर वे मुझसे इतनी कठोरता क्यों कर रहे हैं? उनकी वाणी स...