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Showing posts from July, 2025

सुन्दर काण्ड चौपाई (123-132)

  सुन्दर काण्ड चौपाई 123-132 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: हरिजनजानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।। बूड़तबिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।। अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।। कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।। सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।। कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।। बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।। देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।। मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।। जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।। भावार्थ (सरल अर्थ): हनुमान को अपना सेवक जानकर माता सीता का प्रेम बहुत बढ़ गया। उनकी आँखें आँसुओं से भर गईं और रोमांच (पुलक) से शरीर काँप उठा। वे कहती हैं—"हनुमान! मैं तो विरह सागर में डूब रही थी, तुम मुझे जलपोत (नाव) की तरह पार लगाने वाले बन गए। अब बताओ, राम और लक्ष्मण कुशल से हैं? मैं तो उन पर बलिहारी जाती हूँ।" "रामजी तो कोमल हृदय और दयालु हैं, फिर वे मुझसे इतनी कठोरता क्यों कर रहे हैं? उनकी वाणी स...

सुन्दर काण्ड दोहा (13)

 सुन्दर काण्ड दोहा 13 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा – कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास। जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।। शब्दार्थ कपि – हनुमान जी सप्रेम – प्रेमपूर्वक बिस्वास – विश्वास मन, क्रम, बचन – मन से, कर्म (क्रिया) से, वचन (बोल) से कृपासिंधु – करुणा के सागर, भगवान राम दास – सेवक भावार्थ (सरल अर्थ) सीता जी ने जब हनुमान जी के प्रेमपूर्वक कहे वचन सुने, तब उनके मन में विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह वानर (हनुमान) मन, वचन और कर्म से प्रभु राम के परम भक्त और सेवक हैं। विवेचन (व्याख्या) यह दोहा उस समय का है जब हनुमान जी ने सीता जी को राम का संदेश सुनाया और उनके साथ प्रेमपूर्वक संवाद किया। हनुमान जी की बातों में इतना सच्चा प्रेम, भक्ति और विश्वास था कि सीता जी का रघुनाथजी पर विश्वास और भी दृढ़ हो गया। हनुमान जी ने जो कुछ कहा, वह श्रीराम की भक्ति से पूर्ण था। सीता जी ने अनुभव किया कि यह वानर केवल बोलने में नहीं, बल्कि अपने संपूर्ण जीवन—मन, वचन और कर्म—से भगवान श्रीराम का भक्त है। हनुमान जी की इस संपूर्ण निष्ठा को देखकर सीता जी का मन शांत हुआ और ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (113-122)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 113-122 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।। चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।। जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।। सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।। रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।। लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।। श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।। तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।। राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।। यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।। नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।। भावार्थ: सीता जी ने जब श्रीराम की अंगूठी देखी, जो बहुत सुंदर थी और उस पर राम का नाम अंकित था, तो वे चकित हो गईं। उन्होंने मुद्रिका को पहचान लिया और उनका हृदय हर्ष और विषाद से व्याकुल हो गया। वे सोचने लगीं कि अजेय रघुनाथ को कौन जीत सकता है? यह कोई माया नहीं हो सकती। सीता जी मन ही मन कई प्रकार से विचार कर रही थीं। उसी समय हनुमान जी ने मधुर वाणी में श्रीराम के गुणों का व...

सुन्दर काण्ड दोहा (12)

 सुन्दर काण्ड दोहा 12 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा:  कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब। जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।। शब्दार्थ: कपि – हनुमान जी हृदयँ बिचार – हृदय में विचार करके मुद्रिका – अंगूठी असोक अंगार – अशोक वाटिका में अग्नि (यहाँ संकेतात्मक रूप से उपयोग) हरषि – प्रसन्न होकर गहेउ – पकड़ लिया, ग्रहण किया भावार्थ: हनुमान जी ने यह सोचकर कि माता सीता को अपनी बात पर विश्वास दिलाना आवश्यक है, श्रीराम की दी हुई मुद्रिका (अंगूठी) पेड़ पर से नीचे गिरा दिया। सीता जी ने जैसे ही वह मुद्रिका देखी, मानो उन्हें अशोक वाटिका में जलता हुआ अंगारा (आशा और विश्वास की लौ) मिल गया। वे अत्यंत हर्षित होकर उठीं और उस मुद्रिका को हाथ में लेकर पकड़ लिया। विस्तृत विवेचन इस दोहे में रामदूत हनुमान द्वारा सीता को श्रीराम की मुद्रिका सौंपने की घटना का अत्यंत मार्मिक और प्रतीकात्मक वर्णन किया गया है। जब हनुमान जी ने श्रीराम की मुद्रिका को पेड़ पर से नीचे गिरा दिया , तो यह केवल एक अंगूठी नहीं थी, बल्कि विश्वास, प्रेम और आश्वासन का प्रतीक थी। हनुमान ने पहले विचार किया फिर...

सुन्दर काण्ड चौपाई (99-112)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 99-112 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: "त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।। तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।। आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।। सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।। सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।। निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।। कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।। देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।। पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।। सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।। नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।। देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।" भावार्थ (सरल अर्थ): सीता माता बहुत दुखी होकर त्रिजटा से हाथ जोड़कर कहती हैं — "हे माता! तू मेरी दुख की संगिनी है, अब मेरी सहायता कर। मैं यह विरह और अपमान सहन नहीं कर सकती, मुझे अग्नि दिलाकर चिता बना दो ताकि मैं प्राण त्याग सकूं।" वह अशोक वृक्ष से भी विनती करती हैं — "तू ...

सुन्दर काण्ड दोहा (11)

 सुन्दर काण्ड दोहा 11 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा: जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच। मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।। शब्दार्थ: जहँ तहँ – यहाँ-वहाँ गईं सकल – सभी राक्षसियाँ चली गईं कर मन सोच – मन में सोचने लगीं मास दिवस बीतें – एक महीने की अवधि बीत जाए मारिहि – मारेगा निसिचर पोच – राक्षस नीच (रावण) भावार्थ: जब सभी राक्षसियाँ त्रिजटा के सपने को सत्य मानकर सीता को प्रणाम करके वहां से  चली गईं, तब सीता जी अकेली रह गईं और उनके मन में चिंता उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि एक महीना पूरा हो जाने पर वह नीच राक्षस रावण मुझे अवश्य मार डालेगा। विस्तृत विवेचन: इस दोहे में माता सीता की मानसिक स्थिति को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है। राक्षसियाँ तरह-तरह के भयानक रूप दिखाकर उन्हें डराती हैं और अंत में त्रिजटा के सपने को सत्य मानकर  वहाँ से चली जाती हैं। उनके जाने के बाद सीता जी का मन अत्यधिक विचलित और चिंताग्रस्त हो जाता है। वे सोचती हैं कि रावण ने उन्हें एक महीने की समय-सीमा दी है, और यदि इस समय में उन्होंने उसकी बात नहीं मानी, तो वह उन्हें मार देगा। यह सीत...

सुन्दर काण्ड चौपाई(91-98)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 91-98 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।। सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।। सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।। खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।। एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।। नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।। यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।। तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।। शब्दार्थ संक्षेप में: त्रिजटा – एक राक्षसी, वृद्ध और विवेकी राम चरन रति – श्रीराम के चरणों में भक्ति सेइ – सेवा करो सपना – स्वप्न बानर लंका जारी – वानर द्वारा लंका जलाना दससीसा – रावण खंडित भुज बीसा – रावण की बीसों भुजाएँ कटी हुई दोहाई – प्रार्थना पठाई – भेजा पुकारी – पुकारकर कहा भावार्थ: लंका की एक राक्षसी त्रिजटा थी जो बुद्धिमान और श्रीराम की भक्त थी। उसने सभी राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और सीता माता की सेवा करने की सलाह दी। उसने बताया कि उसके स्वप्न में वानरों ने लंका को जला दिया, राक्षसों की सेना नष्ट हो गई...

सुन्दर काण्ड दोहा (10)

दोहा: "भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद। सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।" (सुंदर कांड, दोहा 10) भावार्थ (सरल अर्थ): जब रावण (दसकंधर) अपने भवन चला गया, तब उसने कई भयानक रूपवाली राक्षसियों (पिशाचिनियों) को आज्ञा दी कि वे सीता को डराएँ। वे राक्षसियाँ अनेक भयंकर और डरावने रूप धारण करके सीता को तरह-तरह से त्रास (कष्ट) देने लगीं। विस्तृत विवेचन: यह दोहा उस समय का वर्णन करता है जब रावण सीता माता को अशोक वाटिका में चेतावनी देकर और राक्षसियों को नियुक्त कर चला गया। रावण जानता था कि सीता को केवल बल प्रयोग से नहीं जीता जा सकता, इसलिए उसने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने के लिए डरावनी राक्षसियों को नियुक्त किया। "भवन गयउ दसकंधर" — रावण, जो दस सिरों वाला था, सीता से वार्तालाप के बाद अपने महल लौट गया। "इहाँ पिसाचिनि बृंद" — उसके आदेश से कई पिशाचिनियाँ (भयानक राक्षस स्त्रियाँ) वहाँ आईं। "सीतहि त्रास देखावहि" — इनका उद्देश्य था सीता को मानसिक रूप से डराकर उनका मनोबल तोड़ना। "धरहिं रूप बहु मंद" — वे अनेक भयंकर, कुरूप और डरावने रूप धारण कर सीता को त...

सुन्दर काण्ड चौपाई (82-90)

चौपाई: "सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।। नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।। स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।। सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।। चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।। सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।। सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।। कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।। मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।। भावार्थ: यह प्रसंग उस समय का है जब अशोक वाटिका में अपनी पत्नी के साथ सीता माता को समझाने जाता है और सीता रावण की तुलना जुगनू से और राम की तुलना सूर्य से करती है। इस पर रावण क्रोधित हो जाता है और अपनी तलवार निकाल लेता है और क्रोध में सीता माता को कहता है। यहां रावण माता सीता से क्रोधित होकर कहता है: "हे सीते! तूने मेरा अपमान किया है। यदि तू मेरी बात नहीं मानेगी, तो मैं अपनी तेज़ तलवार से तेरा सिर काट दूँगा। यदि तू तुरंत मेरी बात स्वीकार कर ले, तो तेरा जीवन बच सकता है। तू अत्यंत सुंदर है, जैसे श्याम क...

सुन्दर काण्ड दोहा (9)

 सुन्दर काण्ड दोहा 9 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान। परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।। शब्दार्थ आपुहि – आप ही (स्वयं) खद्योत – जुगनू भानु – सूर्य परुष – कठोर खिसिआन – अत्यंत क्रोधित भावार्थ सीता माता ने जब श्रीराम की तुलना सूर्य से की और रावण की तुलना जुगनू (खद्योत) से तो रावण अत्यंत क्रोधित हो उठा, और उसने तलवार निकाल ली और कठोर वचन कहने लगा। विस्तृत विवेचन यह दोहा उस प्रसंग का वर्णन करता है जब रावण अशोक वाटिका में सीता माता से मिलकर उन्हें प्रलोभन देने की कोशिश करता  है। तुलसीदास जी यहाँ सुंदर उपमा देते हैं — जैसे जुगनू (जो केवल रात में टिमटिमाता है) और सूर्य के समान बनने का घमंड करे, वैसे ही रावण की तुलना श्रीराम से करना मूर्खता और अहंकार का प्रमाण है।

सुन्दर काण्ड चौपाई (73-81)

  चौपाई तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।। तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।। बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।। कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।। तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।। तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।। सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।। अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।। सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।। भावार्थ (सरल भाषा में): हनुमान जी पेड़ की पत्तियों में छिपकर यह विचार कर रहे हैं कि अब क्या करना चाहिए। तभी रावण बहुत सारी स्त्रियों और साज-सज्जा के साथ सीता माता के पास आता है। वह अनेक प्रकार से उन्हें बहकाने की कोशिश करता है — कभी प्रेम से, कभी दान का लालच देकर, कभी डराकर और कभी छल से। रावण कहता है — हे सुंदर और बुद्धिमती स्त्री! मेरी रानियाँ तो मंदोदरी आदि हैं, पर मैं तुम्हें अपनी मुख्य रानी बनाऊँगा। बस एक बार मेरी ओर देख लो। परन्तु सीता जी घास की ओट लेकर बैठ जाती हैं और भगवान राम को स्मरण कर कहती हैं — "हे रावण! जैसे ज...

सुन्दर काण्ड दोहा (8)

 सुन्दर काण्ड दोहा 8 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा: निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन। परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।। शब्दार्थ: निज पद नयन दिएँ – अपने चरणों को जानकी जी ने आँखों से देखा मन राम पद कमल लीन – मन श्रीराम के चरण कमलों में लीन रहा परम दुखी भा पवनसुत – पवनपुत्र हनुमान अत्यंत दुखी हो गए देखि जानकी दीन – जानकी (सीता माता) की दीन दशा देखकर भावार्थ: सीता माता की दशा बहुत ही दुःखद हो गई थी। उन्होंने अपने पैरों की ओर देखा लेकिन मन तो प्रभु श्रीराम के चरणों में ही लीन था। जब हनुमान जी ने माता सीता की ऐसी दीन-हीन, दुःखभरी स्थिति देखी, तो वे अत्यंत दुःखी हो गए। विस्तृत विवेचन: यह दोहा उस प्रसंग को दर्शाता है जब हनुमान जी अशोक वाटिका में माता सीता को पहली बार देखते हैं। वे देख रहे हैं कि माता अत्यंत पीड़ित, चिंतित और अत्याचार सहन कर रही हैं। सीता जी का मन हर समय श्रीराम के ध्यान में मग्न है, और वे अपने शरीर की ओर भी ध्यान नहीं देतीं। इस स्थिति में, जब वे अपने पैर की ओर देखती हैं, तो यह दर्शाता है कि वे संसार से जैसे पूरी तरह विरक्त हो चुकी हैं, लेकिन हृदय से प्रभु श्रीर...

सुन्दर काण्ड चौपाई (65-72)

 यह चौपाई और उसके आस-पास की पंक्तियाँ रामचरितमानस के सुन्दर काण्ड से ली गई हैं। यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमान जी लंका पहुँच चुके हैं और माता सीता की खोज कर रहे हैं। उन्होंने विभीषण से मिलकर सीता माता का स्थान जाना और अब वे उन्हें देखने हेतु अशोक वाटिका में जा रहे हैं। चौपाई 65 जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।। भावार्थ: विभीषण जी सोचते हैं—प्रभु उन्हें भूल गए है। अब एक-एक चरण का विस्तृत विवेचन करते हैं: ‘जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।’ विभीषण सोचते हैं  कि श्रीराम उनके परम प्रिय स्वामी हैं, वे उन्हें अवश्य ढूंढ लेंगे, उनकी रक्षा करेंगे। फिर ऐसा कौन-सा कारण है कि उस विश्वास के होते हुए भी वे इतना दुःख क्यों सह रहे हैं? इसका कारण यह बताया गया है कि— ‘फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।’ अर्थात् वे दुःखी हो रही हैं क्योंकि यह स्वाभाविक है। शरीरधारी जीव, चाहे जितना ज्ञानी या भक्त क्यों न हो, जब दुखद परिस्थिति आती है तो मन विचलित हो सकता है। यह भाव यह दर्शाता है कि विभीषण जी दिन-रात राम का स्मरण करते हैं, फिर भी कष्ट में हैं, क्योंकि यह संसार का स्वाभाविक नियम है। ...

सुन्दर काण्ड दोहा (7)

 सुन्दर काण्ड दोहा 7 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: यह दोहा हनुमान जी और विभीषण के बीच बातचीत का अंश है जब लंका में सीता की खोज के क्रम में विभीषण और हनुमान जी की मुलाकात हुई  दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।" शब्दार्थ: अस मैं अधम – ऐसा मैं अधम (नीच और अयोग्य व्यक्ति) हू सखा सुनु – हे मित्र! सुनो मोहू पर रघुबीर कीन्ही कृपा – मुझ पर श्री रघुबीर (भगवान राम) ने कृपा की सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर – उनके गुणों को स्मरण करके नेत्रों में प्रेमाश्रु भर आए भावार्थ: इस दोहे में हनुमान जी अपनी विनम्रता से कहते हैं कि — “हे सखा! सुनो, मैं तो अत्यंत अधम, तुच्छ और दोषों से भरा हुआ प्राणी हूँ; फिर भी रघुनाथ भगवान (श्रीराम) ने मुझ पर कृपा की। जब मैं उनके गुणों को स्मरण करता हूँ, तो मेरे नेत्रों से प्रेम और श्रद्धा के आँसू बहने लगते हैं।” विस्तृत विवेचन: विनम्रता और भक्ति भाव: हनुमान जी गहरे आत्मविलीन भाव में स्वयं को "अधम" कहकर भगवान की निष्काम कृपा को दर्शा रहे हैं। यह भक्त की चरम विनम्रता का प्रतीक है कि वह स्वयं को तुच्छ मानते हुए भगव...

सुन्दर काण्ड चौपाई (57-64)

यह चौपाई सुन्दर काण्ड का है जिसमें हनुमानजी और विभीषण के संवाद को दिखाया गया है:  चौपाई: 57 "सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।" भावार्थ: हे पवन पुत्र हनुमान! हमारे जीवन की दशा ऐसी है जैसे दस इन्द्रियों के बीच में विवेक रूपी एक जीभ अपनी मर्यादा में रहकर कार्य करती है। उसी प्रकार हम विपरीत वातावरण में भी अपनी श्रद्धा और भक्ति बनाए रखें — यह आप ही की कृपा से संभव है। विवेचन: यहाँ भक्त अपनी कठिन परिस्थिति और तुच्छता को व्यक्त करते हुए कह रहा है कि कठिन संसार में जहाँ अनेक विकार हैं, वहाँ एकमात्र हनुमानजी की कृपा से ही साधक सही मार्ग पर रह सकता है। 58. "तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।" भावार्थ: हे तात (प्यारे हनुमानजी), जब प्रभु श्रीराम (भानुकुल नाथ) मुझे अनाथ (असहाय) जानेंगे, तब वे मुझ पर अवश्य ही कृपा करेंगे। विवेचन: इसमें भक्त की निष्कपट पुकार है। वह मानता है कि जब श्रीराम को पता चलेगा कि इस भक्त का कोई सहारा नहीं है, तो वे अपने स्वभाववश उस पर कृपा करेंगे क्योंकि श्रीराम तो दीनों पर दया करना अपना धर्म मानते हैं। 59. "त...

सुन्दर काण्ड दोहा (6)

 सुन्दर काण्ड दोहा 6 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।। भावार्थ: जब हनुमान जी ने स्वयं भगवान राम के नाम और राम कथा को अपने ही शब्दों में व्यक्त किया, तब विभीषण के शरीर में रोम-रोम तक आनंद की झंकार हुई। उनका मन पूरी तरह प्रसन्न और मग्न हो गया, और वे राम के गुणों का निरंतर स्मरण करने लगे। विस्तृत विवेचन: "तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम": यहाँ हनुमान जी स्वयं अपने शब्दों में राम की कथा का वर्णन कर रहे हैं। 'निज नाम' का अर्थ है अपने नाम अर्थात अपनी भाषा या अपने अंदाज में। हनुमान जी का यह वर्णन भक्ति से ओतप्रोत और भावपूर्ण होता है। "सुनत जुगल तन पुलक": 'जुगल' का अर्थ होता है जोड़ी या दो लोग, हनुमान और विभीषण, हनुमान जी की कथा सुन रहे थे। ये सुनते समय उनके शरीर में 'पुल्क' अर्थात कंपन या भावनाओं का संचार हो गया, जो आन्तरिक उल्लास, आनंद और श्रद्धा का संकेत है। "मन मगन सुमिरि गुन ग्राम": उनका मन राम के गुणों और लीलाओं को याद करते हुए पूरी तरह मग्न हो गया। ...

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 49-56)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 49-56 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।। मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।। शब्दार्थ व भावार्थ: – लंका = रावण की राजधानी, – निसिचर निकर निवासा = राक्षसों का समूह जहाँ वास करता है, – सज्जन कर बासा = सज्जनों (भले व्यक्तियों) का निवास, – तरक = विचार करना हनुमानजी सोचने लगते हैं कि ये लंका तो राक्षसों का घर है, यहाँ भले लोगों का क्या काम? यानी क्या किसी सज्जन का यहाँ पर वास संभव है? उनके मन में विचार आता है कि हो सकता है यहाँ कोई भला व्यक्ति हो। उसी समय विभीषण जागते हैं। भावार्थ: लंका राक्षसों की नगरी है, ऐसे स्थान पर सज्जन व्यक्ति का वास संदेहास्पद लगता है। हनुमानजी सोचते हैं कि क्या शकुन्तलों के बीच में कोई साधू भी हो सकता है? तभी विभीषण प्रकट होते हैं, जो स्वयं एक सत्पुरुष हैं। अगली पंक्तियाँ: राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।। एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।। विभीषण ‘‘राम-राम’’ नाम स्मरण करते हैं, जिससे हनुमानजी अत्यंत प्रसन्न होते हैं और यह पहचान ले...

सुन्दर काण्ड दोहा (5)

 सुन्दर काण्ड दोहा 5 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0 - रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।" यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित सुन्दरकाण्ड का एक अंश है, जिसमें हनुमानजी लंका में सीता माता के खोज में लंका में भ्रमण कर रहे हैं। वहां उन्हें एक ऐसा घर दिखाई दिया जहां श्रीराम के अस्त्र-शस्त्रों के चिह्नों से युक्त (राम नाम या राम के प्रतीकों से अंकित) था और तुलसी के नये पौधे लगे हुए थे। शब्दार्थ: रामायुध अंकित – श्रीराम के अस्त्र-शस्त्रों के चिह्नों से युक्त (राम नाम या राम के प्रतीकों से अंकित) गृह सोभा – घर की शोभा बरनि न जाइ – वर्णन नहीं की जा सकती नव तुलसिका बृंद – नवीन तुलसी के पौधों का समूह हरषि कपिराइ – वानरराज (हनुमान) हर्षित हो गए भावार्थ: हनुमानजी जब सीता माता की खोज में लंका भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने वहाँ के एक भवन को देखा, जिसकी शोभा अत्यंत अद्भुत थी। वह भवन श्रीराम के अस्त्र-शस्त्रों के चिह्नों से युक्त था, जिससे उसकी पवित्रता और दिव्यता झलक रही थी। वहाँ तुलसी के नए-नए पौधे लगे हुए थे, जिन्हें देखकर हनुमानजी अत्यंत प्रसन्न ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (44-48)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 44-48 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।। मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।। गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।। सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।। भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।। भावार्थ (सरल अर्थ): हनुमान जी ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण करते हुए लंका नगरी में प्रवेश किया। वे हर मंदिर में जाकर सीता माता को ढूंढने लगे, लेकिन जहाँ-जहाँ भी गए, वहाँ उन्हें असंख्य राक्षस सैनिक ही दिखाई दिए। फिर वे रावण के महल में पहुँचे, जो अत्यंत विचित्र और अनोखा था, जिसकी तुलना नहीं की जा सकती। वहाँ हनुमान जी ने देखा कि रावण सो रहा है, लेकिन सीता माता वहाँ भी नहीं मिली। फिर उन्हें एक और सुंदर भवन दिखाई दिया, जो अन्य मंदिरों से अलग और विशेष था। विस्तृत विवेचन: 1. अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।। हनुमान जी ने लंका में प्रवेश करने के लिए अपना आकार बहुत छोटा कर लिया, ताकि कोई उन्हें देख न सके। वे भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए लंक...

सुन्दर काण्ड चौपाई (41-43)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 41-43 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।। गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।। गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।। शब्दार्थ प्रबिसि: प्रवेश करके नगर: नगर (लंका) कीजे सब काजा: सभी कार्य कीजिए हृदयँ राखि कौसलपुर राजा: हृदय में अयोध्या के राजा (राम) को रखकर गरल: विष सुधा: अमृत रिपु: शत्रु मिताई: मित्रता गोपद: गाय का खुर सिंधु: समुद्र अनल: अग्नि सितलाई: शीतलता गरुड़: विशाल पक्षी (गरुड़) सुमेरु: महान पर्वत रेनू: धूल ताही: उसे राम कृपा करि: श्रीराम की कृपा से चितवा जाही: जिसे देख लेता है भावार्थ हनुमानजी को लंकिनी समझाती है कि, "हे हनुमानजी जब भी कोई कार्य करना हो, तो पहले अपने हृदय में श्रीराम को बसाकर (उनका स्मरण करके) ही कार्य करना चाहिए। जब श्रीराम की कृपा दृष्टि हो जाती है, तो विष भी अमृत बन जाता है, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं, गाय के खुर के बराबर समुद्र हो जाता है (अर्थात् कठिन कार्य भी सहज हो जाता है), अग्नि शीतल हो जाती है, और गरुड़ जैसे विशाल पर्वत भी धूल के समान हल्के हो जाते...

सुन्दर काण्ड दोहा (4)

 सुन्दर काण्ड दोहा 4 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दोहा "तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।" भावार्थ हे तात (प्रियजन)! स्वर्ग, मोक्ष (अपवर्ग) और संसार के समस्त सुखों को यदि एक पलड़े में रखा जाए, और दूसरी ओर सत्संग (सज्जनों की संगति) के एक क्षण के सुख को रखा जाए, तो वह सत्संग का सुख उन सब पर भारी पड़ता है। अर्थात् सत्संग का एक क्षणिक सुख भी स्वर्ग, मोक्ष और संसार के समस्त भौतिक सुखों से श्रेष्ठ है। विस्तृत विवेचन 1. शब्दार्थ तात: प्रियजन, पुत्र, शिष्य या किसी प्रिय को संबोधित करने वाला शब्द। स्वर्ग: वह स्थान जहाँ दिव्य सुख प्राप्त होते हैं। अपबर्ग (अपवर्ग): मोक्ष, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति। सुख: आनंद, प्रसन्नता। तुला: तराजू। तूल: तुलना। सकल: सभी। लव: एक क्षण, बहुत कम समय। सतसंग: संतों, सज्जनों या सत्पुरुषों की संगति। 2. संदर्भ यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के सुंदरकांड का है। इसमें हनुमान जी को लंकिनी ने सत्संग (संतों की संगति) के महत्व के बारे में बताया  है। 3. भावार्थ की व्याख्या तुलसीदास जी कहते हैं...

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 33-40 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।। नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।। जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।। मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।। पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।। जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।। बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।। तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।। भावार्थ (सारांश) हनुमानजी ने मच्छर के समान छोटा रूप धारण किया और भगवान नरहरि (श्रीराम) का स्मरण करते हुए लंका की ओर चले। लंका के द्वार पर लंकिनी नामक एक राक्षसी रहती थी, जिसने हनुमानजी को रोककर अपमानित किया और कहा—"हे मूर्ख! तू मेरा रहस्य नहीं जानता। जहाँ तक कोई चोर आता है, वह मेरा आहार बनता है।" हनुमानजी ने उसे एक घूंसा मारा, जिससे वह भूमि पर गिरकर खून उगलने लगी। फिर वह संभलकर उठी और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोली—"जब ब्रह्मा ने रावण को वरदान दिया था, तब ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि जब कोई वानर आकर तुझे मारेगा,...

सुन्दर काण्ड दोहा (3)

 सुन्दर काण्ड दोहा 3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0- पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।। भावार्थ (सरल अर्थ) हनुमानजी ने देखा कि लंका के नगर की रक्षा के लिए बहुत सारे रक्षक (रक्षासैनिक) तैनात हैं। यह देखकर हनुमानजी ने मन में विचार किया कि यदि मैं अपने विशाल रूप में यहाँ प्रवेश करूंगा तो पकड़ा जाऊँगा। इसलिए उन्होंने सोचा कि मैं अपना आकार बहुत छोटा कर लूँ और रात के समय लंका नगरी में प्रवेश करूँ। विस्तृत विवेचन प्रसंग यह दोहा श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का है। जब हनुमानजी समुद्र पार करके लंका पहुँचते हैं, तब वे सीता माता की खोज के लिए लंका नगरी में प्रवेश करना चाहते हैं। लंका की सुरक्षा बहुत कड़ी थी, जगह-जगह राक्षस प्रहरी तैनात थे। विवेचन पुर रखवारे देखि बहु: हनुमानजी ने देखा कि लंका के चारों ओर बहुत से रक्षक (राक्षस) पहरा दे रहे हैं। लंका की सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी। कपि मन कीन्ह बिचार: हनुमानजी ने मन में विचार किया कि यदि मैं अपने सामान्य (विशाल) रूप में यहाँ प्रवेश करता हूँ, तो रक्षकों की दृष्टि में आ जाऊँगा और मेरा उद्देश्...

सुन्दर काण्ड छंद (1-3)

 सुन्दर काण्ड छंद 1-3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: छंद कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।। गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।। बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।। कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।। करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।। एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।। भावार्थ (सरल अर्थ) हनुमानजी जब लंका पहुँचते हैं, तो वे वहाँ की भव्यता और रावण की सेना का वर्णन करते हैं: लंका का वैभव: सोने की बनी हुई लंका की दीवारें, उसमें जड़े हुए अनगिनत रत्न, सुंदर और घने महल, चौक-चौराहे, बाजार, सुंदर सड़कें – हर प्रकार से लंका नगरी अत्यंत सुंदर और समृद्ध है। सेना और राक्षसों का वर्णन: लंका में हाथियों, घोड़ों, खच्चरों, पैदल सैनिकों और रथों की अपार संख्या है, ज...

सुन्दर काण्ड चौपाई (29-32)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 29-32 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।। उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।। गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।। अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।। यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकाण्ड से ली गई है। इसमें हनुमानजी के लंका पहुँचने और वहाँ की भव्यता, सुरक्षा और दुर्गमता का वर्णन है। भावार्थ हनुमानजी समुद्र पार करके लंका के समीप पहुँचते हैं। वहाँ उन्होंने एक विशाल पर्वत देखा। भय को त्यागकर वे उस पर्वत पर चढ़ गए। माता पार्वती (उमा) को शिवजी कहते हैं कि इसमें हनुमानजी की कोई विशेषता नहीं, यह सब श्रीराम के प्रताप का ही प्रभाव है, जिससे काल (मृत्यु) भी पराजित हो जाता है। पर्वत पर चढ़कर हनुमानजी ने लंका नगरी को देखा, जो अत्यंत दुर्गम थी। चारों ओर समुद्र था और सोने की बनी हुई उसकी प्राचीर (दीवारें) अत्यंत चमक रही थीं। विस्तृत विवेचन 1. सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें। हनुमानजी समुद्र पार करने के बाद लंका के निकट एक विश...

सुन्दर काण्ड (27-28)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 27-28 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई: तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।। नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।। आइए, इसका भावार्थ एवं विस्तृत विवेचन करते हैं— शब्दार्थ तहाँ – वहाँ (समुद्र के किनारे) जाइ – जाकर देखी – देखी बन सोभा – वन की शोभा (सौंदर्य) गुंजत – गूंज रही थी चंचरीक – भौंरे मधु लोभा – मधु (शहद/रस) के लोभ में नाना तरु – अनेक प्रकार के वृक्ष फल फूल सुहाए – सुंदर फल-फूल खग – पक्षी मृग बृंद – पशु समूह मन भाए – मन को भाने वाले भावार्थ हनुमानजी जब सिंहिका को मार कर आगे बढ़े तो समुद्र पार करने के बाद उन्होंने वहाँ के वन की अनुपम शोभा देखी। वहाँ भौंरे मधुर रस के लोभ में गूंज रहे थे। अनेक प्रकार के सुंदर वृक्ष, उन पर खिले हुए रंग-बिरंगे फूल और स्वादिष्ट फल, तथा पक्षियों और पशुओं के समूह वहाँ की शोभा को और भी बढ़ा रहे थे। यह दृश्य हनुमानजी के मन को बहुत भाया। विस्तृत विवेचन 1. प्रसंग यह चौपाई सुंदरकाण्ड में तब आती है, जब समुद्र पार करने के बाद वे लंका की ओर आगे बढ़े तो वहां के वनों की शोभा देखकर वे मुग्ध हो जाते हैं। 2. प्राकृतिक ...

सुन्दर काण्ड चौपाई (24-26)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 24-26 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।। सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।। ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।। भावार्थ हनुमान जी जब समुद्र पार कर रहे थे, तब मार्ग में अनेक बाधाएँ आईं। उन्हीं में से एक 'सिंहिका' नामक राक्षसी थी, जो अपनी छाया पकड़कर आकाश में उड़ने वाले प्राणियों को नीचे गिरा देती थी और फिर उन्हें खा जाती थी। जब हनुमान जी समुद्र पार कर रहे थे, तब सिंहिका ने भी उनकी छाया पकड़ ली, जिससे हनुमान जी का आगे बढ़ना रुक गया। हनुमान जी ने तुरंत उसकी चालाकी (कपट) को पहचान लिया और उसे मार डाला। फिर वे वीरता और धैर्य के साथ समुद्र पार कर गए। शब्दार्थ गहइ छाहँ — छाया पकड़ती है सक सो न उड़ाई — जिससे कोई उड़ नहीं सकता गगनचर — आकाश में चलने वाले (उड़ने वाले) खाई — खा जाती है छल — कपट, चालाकी मारुतसुत — पवनपुत्र (हनुमान जी) बीरा — वीर बारिधि पार — समुद्र पार मतिधीरा — बुद्धिमान और धैर्यवान विस्तृत विवेचन 1. प्रसंग हनुमान जी लंका की ओर जा रहे हैं। मार्ग में उन्हें अनेक बाधाएँ आती हैं...

सुन्दर काण्ड चौपाई (22-23)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 22-23 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।। जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।। यह चौपाई श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड से ली गई है। आइए इसका भावार्थ और विस्तृत विवेचन करें। भावार्थ समुद्र में एक राक्षसी रहती थी, जो मायावी थी। वह आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को पकड़ लेती थी। जो भी जीव-जंतु आकाश में उड़ते और समुद्र के ऊपर से जाते, वे जब समुद्र में अपनी छाया देखते, तो वह राक्षसी उन्हीं की छाया पकड़कर उन्हें निगल जाती थी। विस्तृत विवेचन 1. संदर्भ यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमानजी समुद्र पार कर लंका जा रहे हैं। मार्ग में उन्हें कई बाधाएँ आती हैं। इन्हीं में से एक राक्षसी है, जो समुद्र में रहती है। 2. शब्दार्थ निसिचरि: रात्रि में विचरण करने वाली, अर्थात राक्षसी। सिंधु महुँ रहई: समुद्र में रहती थी। करि माया: माया (जादू/छल) करके। नभु के खग गहई: आकाश के पक्षियों को पकड़ लेती थी। जीव जंतु: जीव-जन्तु, विशेषकर पक्षी। गगन उड़ाहीं: आकाश में उड़ते हैं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं: जल (समुद्र) में अपनी छाया द...

सुन्दर काण्ड (दोहा 2)

 सुन्दर काण्ड दोहा 2 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।। यह दोहा श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का दूसरा दोहा है। इसमें हनुमान जी के चरित्र और उनके कार्य के प्रति उनकी तत्परता का सुंदर चित्रण है। भावार्थ इस दोहे में कहा गया है कि— हे हनुमान! तुम बल और बुद्धि के भंडार हो। तुम श्रीराम के सभी कार्य अवश्य ही करोगे। माता सुरसा ने तुम्हें आशीर्वाद दिया और हनुमान जी हर्षित होकर वहाँ से चल पड़े। विस्तृत विवेचन 1. परिस्थिति का वर्णन यह दोहा उस प्रसंग से संबंधित है जब सुरसा माता की परीक्षा में हनुमान जी सफल होते हैं और वह कहती है :-हनुमान! तुम बल और बुद्धि के भंडार हो। तुम श्रीराम के सभी कार्य अवश्य ही करोगे। माता सुरसा ने तुम्हें आशीर्वाद दिया और हनुमान जी हर्षित होकर वहाँ से चल पड़े। 2. हनुमान जी की विशेषताएँ बल-बुद्धि निधान: हनुमान जी के पास अपार बल (शक्ति) और बुद्धि (चतुराई) है। यही कारण है कि वे असंभव कार्य को भी संभव बना सकते हैं। राम काजु सबु करिहहु: श्रीराम के कार्यों को करना ही हनुमान जी का जीवन-धर्म है। व...

सुन्दर काण्ड चौपाई (17-21)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 17-21 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: चौपाई सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।। जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।। सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।। बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।। मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।। भावार्थ हनुमानजी जब समुद्र पार कर रहे थे, तब मार्ग में सुरसा नामक सर्पों की माता, जिसे देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने के लिए भेजा था। सुरसा ने हनुमानजी से कहा कि वह उन्हें खा जाएगी। हनुमानजी ने विनम्रता से कहा कि वे रामजी का कार्य करके लौटते समय उसके मुख में प्रवेश कर लेंगे, पर सुरसा नहीं मानी और उसने अपना मुख सोलह योजन (लगभग 128 मील) चौड़ा कर लिया। हनुमानजी ने तुरंत अपना शरीर बत्तीस योजन (256 मील) बड़ा कर लिया। सुरसा ने जितना अपना मुख बढ़ाया, हनुमानजी ने उससे दुगना अपना शरीर बढ़ा लिया। अंत में हनुमानजी ने बहुत छोटा रूप धारण किया और झट से उसके मुख में प्रवेश कर बाहर निकल आए। इस प्रकार उन्होंने उसकी शर्त पूरी कर दी। सुरसा ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कह...

सुन्दर काण्ड (चौपाई 15-16)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 15-16 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।। जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।। भावार्थ हनुमान जी कहते हैं कि माता (सुरसा ) आप कोई भी प्रयास कर लीजिए, परंतु आप मुझे अपना भोजन नहीं बना पाएंगी। हनुमान जी का शरीर (कपि तनु) सुरसा के शरीर की तुलना में दुगुना बड़ा हो गया है, सुरसा माता ने जब अपना शरीर पूरे जोजन भर (एक जोजन लगभग 8-9 मील होता है) का शरीर का विस्तार कर लिया अर्थात फैला लिया तब हनुमान जी ने अपना शरीर दोगुना फैला दिया। विस्तृत विवेचन "कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना" यहां हनुमान जी की विनम्रता प्रकट होती है जो सुरसा माता को किसी प्रकार का नुक़सान नहीं पहुंचाना चाहते हैं, इसीलिए उन्होंने सुरसा माता को नुक़सान पहुंचाने के जगह अपने शरीर का विस्तार करना हीं उचित समझा। "ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना" 'ग्रससि' का अर्थ है निगलना या खा जाना। हनुमान स्वयं कह रहे हैं कि सुरसा उन्हें कभी भी निगल नहीं पाएंगे। यह उनके विशाल और शक्तिशाली रूप को दर्शाता है। साथ ही यह भी बताता है कि सुर...