सुन्दर काण्ड दोहा (58)
सुन्दर काण्ड दोहा 58 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा:
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
भावार्थ (सरल अर्थ):
हे गरुड़ जी!जैसे केले का पेड़ काट देने पर भी फिर से उग आता है, और चाहे कोई उसे कितना भी बार-बार सींचे या सँभाले, उसकी प्रकृति (मुलायमपन और नर्मी) नहीं बदलती।
उसी प्रकार, नीच स्वभाव के व्यक्ति को चाहे कितनी ही विनम्रता और नम्र व्यवहार से समझाया जाए, वह नहीं मानता; उसे तो डाँटकर, कठोर व्यवहार से ही वश में किया जा सकता है।
विस्तृत विवेचन:
यह दोहा श्रीराम और समुद्र के संवाद के प्रसंग में आता है। भगवान राम तीन दिन तक नम्रता से समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करते रहे, परंतु जब समुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया, तब भगवान ने क्रोधित होकर कहा —
"हे गरुड़जी! जैसे केले के पेड़ को काटने पर भी वह फिर उग आता है, वैसे ही दुष्ट और नीच स्वभाव के लोग नम्रता से नहीं सुधरते।
उन्हें केवल कठोरता और दंड से ही वश में किया जा सकता है।"
इसमें तुलसीदास जी नीच व्यक्ति के स्वभाव की अडिगता बताना चाहते हैं।
सज्जन व्यक्ति प्रेम और विनम्रता से सुधरता है।
दुष्ट व्यक्ति केवल भय और कठोरता से नियंत्रित किया जा सकता है।
मुख्य शिक्षा:
1. नीच और अहंकारी व्यक्ति विनम्रता से नहीं मानता, उसे डाँट-फटकार से ही वश में किया जा सकता है।
2. भगवान श्रीराम का यह दोहा धर्म में कठोरता की आवश्यकता को दर्शाता है — जब प्रेम से बात न बने, तो दंड ही उचित उपाय होता है।
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