सुन्दर काण्ड दोहा (51)

 

दोहा –

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।

प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

भावार्थ

विभीषण के लंका से राम के पास आने के बाद रावण ने अपने गुप्तचर को भेजा था जो  बंदर का वेश धारण कर कपट रूप में था । उन्होंने प्रभु के द्वारा विभीषण की शरणागति को देखकर सच्चे हृदय से सराहना की।

विस्तृत विवेचन:

इस दोहे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम के शरणागत-वत्सल स्वभाव का सुंदर चित्रण किया है।

1. “सकल चरित तिन्ह देखे”—

रावण के गुप्तचरों ने राम के द्वारा विभीषण की शरणागति को अपनी आंखों से देखा।

2. “धरें कपट कपि देह”—

रावण के गुप्तचरों ने बानर का कपट वेश धारण कर रखा था।


3. “प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं”—

गुप्तचरों ने सच्चे हृदय से भगवान राम की सराहना की।

श्रीराम का यह गुण है कि वे शरणागत की रक्षा अवश्य करते हैं। उनका हृदय करुणा से भर जाता है जब कोई भी जीव सच्चे मन से उनकी शरण में आता है।

4. “सरनागत पर नेह”—

यह पंक्ति भगवान के प्रेम और दया का सार है। चाहे कोई कितना भी दोषी क्यों न हो, यदि वह सच्चे हृदय से प्रभु की शरण ग्रहण करे, तो प्रभु उसे अपने हृदय से लगाते हैं।

निष्कर्ष:

इस दोहे से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान श्रीराम कपट या छल नहीं, बल्कि सच्चे मन की भक्ति को स्वीकार करते हैं। जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा और निष्ठा से प्रभु की शरण में आता है, वह निश्चित रूप से उनकी कृपा का अधिकारी बनता है।

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