सुन्दर काण्ड दोहा(56)
दो0–बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।
भावार्थ (संक्षेप में)
रावण के गुप्तचर रावण को समझाते हुए कहते हैं —
हे मूर्ख रावण! मीठी बातों से अपने मन को मत बहला। श्रीराम से विरोध करने वाला न तो विष्णु, न ब्रह्मा, न शिव — कोई भी बच नहीं सकता।
अब दो ही रास्ते हैं — या तो अपने अभिमान को छोड़कर प्रभु श्रीराम के चरणों में भृंग (भँवरे) की तरह लग जा, या फिर अपने कुल सहित राम के बाण रूपी अग्नि में पतंग की तरह जल जाएगा।
विस्तृत विवेचन:
जब गुप्तचर ने रावण को अनेक प्रकार से समझाया कि श्रीराम साक्षात् परमात्मा हैं, तब भी रावण अहंकार में डूबा रहा। इस पर गुप्तचर ने यह दोहा कहा।
पहला भाग (56क):
गुप्तचर कहते हैं — हे रावण! व्यर्थ की बातों से अपने मन को धोखा मत दे। श्रीराम से विरोध करना मृत्यु को बुलाना है। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिव तक यदि राम के विरोधी बनें तो उनका भी उद्धार नहीं हो सकता। तो फिर तेरा क्या होगा?
दूसरा भाग (56ख):
अब तेरे सामने दो मार्ग हैं —
1. ‘तजि मान अनुज इव’ — अपने छोटे भाई विभीषण की तरह अभिमान त्यागकर प्रभु के चरणों में शरण ले ले।
2. ‘होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग’ — नहीं तो श्रीराम के बाणों के अग्नि समान प्रकोप में तू और तेरा पूरा कुल पतंग की तरह जलकर नष्ट हो जाएगा।
निष्कर्ष:
यह दोहा गुप्तचर की बुद्धिमत्ता और सत्यनिष्ठा को दर्शाता है।
उन्होंने अपने स्वामी रावण के सामने भी भगवान श्रीराम की महिमा बताकर धर्म का मार्ग दिखाया।
परंतु रावण के हृदय में अहंकार इतना था कि वह इस सत्य को स्वीकार नहीं कर सका — और यही उसके विनाश का कारण बना।
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