सुन्दर काण्ड दोहा (53)

 सुन्दर काण्ड दोहा 53 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0–की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।

कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

भावार्थ

रावण अपने गुप्तचरों से कहता जिसे उन्होंने विभीषण के पीछे भेजा था और जो लक्ष्मण का पत्र लेकर आया है कि — क्या तुमने उनसे मुलाकात की या वे लोग मेरी कीर्ति को सुनकर यहां से वापस लौट गए। तुम शत्रु के तेज और बल के बारे में बता नहीं रहे हो और तुम दिल से बहुत आश्चर्यचकित हो।

विस्तृत विवेचन

1. संदर्भ (किस बात का समाचार)

दोहे में बताई 'भेंट' से तात्पर्य वह घटना/मुलाक़ात है जिसके बारे में रावण अपने गुप्तचरों से जानना चाहते हैं।

2. शब्दार्थ और सूक्ष्मता

की भइ भेंट कि फिरि गए — किस प्रकार की (aisi) भेंट/मुलाक़ात हुई कि वे लौट गए/पीछे हट गए (यानि उनकी हिम्मत टूट गई)।

श्रवन सुजसु सुनि मोर — “श्रवन” = सुनना; “सुजसु” = कीर्ति अर्थात रावण समझ रहे हैं कि उनकी कीर्ति के बारे में सुनकर राम, बानर सेना को लेकर वापस लौट गए।

कहसि न रिपु दल तेज बल — गुप्तचर शत्रु-दल की तेज-बल (शक्ति, पराक्रम) का कोई विवरण नहीं दे रहा है।

बहुत चकित चित तोर — वे बहुत स्तब्ध/आश्चर्यचकित हैं।

3. भावात्मक अर्थ / काव्यात्मक प्रभाव

दोहा में सूचक भाव यह है — कभी-कभी एक खबर या सही जानकारी ही प्रतिकूल ताकतों को पराजित कर दे — भले ही उनकी वास्तविक ताकत बड़ी हो। यह आश्चर्य, उलझन और मनोवैज्ञानिक प्रभाव को उजागर करता है: शक्ति केवल शारीरिक नहीं, सूचना/सत्य/नीति भी निर्णायक हो सकती है।

4. शिक्षा / निष्कर्ष

जानकारी और न्यायसंगत कदमों का महत्त्व: सही समय पर सही समाचार ही विपक्षी मनोबल गिरा सकता है।

दिखावट वाली ताकत हमेशा निर्णायक नहीं: बाहरी तेज़ी और बल दिखने पर भी आंतरिक स्थिति बदल सकती है — इसलिए बुद्धि, सत्य और समय पर निर्णय अधिक प्रभावी होते हैं।



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