सुन्दर काण्ड दोहा (54)

 सुन्दर काण्ड दोहा 54 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा –

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।

दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

भावार्थ (सरल अर्थ):

रावण के गुप्तचरों ने रामसेना के प्रमुख योद्धाओं का वर्णन किया है। द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकट, दधिमुख, केहरी, निषठ और जाम्बवान — ये सब महाबली वानर हैं। इन सबमें जाम्बवान (भालू-राज) को "बलराशि" यानी बल का भंडार कहा गया है।

विस्तृत विवेचन:

इस दोहे में रावण के गुप्तचरों ने रामभक्तों की वीरता और निष्ठा को प्रकट किया है।

1. रामसेना के नायक:

यहाँ जो नाम लिए गए हैं — द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकट, दधिमुख, केहरी, निष्ठ — ये सब उस वानरसेना के प्रमुख सेनानायक हैं जिन्होंने लंका विजय में श्रीराम का साथ दिया।

नील-नल ने समुद्र पर पुल बनाया।

अंगद ने रावण के दरबार में जाकर राम का संदेश सुनाया।

जाम्बवान ने सबका नेतृत्व कर बुद्धि और अनुभव से सबको एकजुट किया।

2. जाम्बवान बलरासि:

रावण के गुप्तचरों ने जाम्बवान को "बलराशि" कहा है — इसका अर्थ है कि वे न केवल शारीरिक बल से प्रबल हैं, बल्कि धैर्य, विवेक और नेतृत्वबल से भी महान हैं। उन्होंने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया था — जिससे लंका दहन की प्रेरणा मिली।

निष्कर्ष:

यह दोहा श्रीराम के पराक्रमी सेवकों की एक झलक प्रस्तुत करता है। इसमें यह संदेश निहित है कि भगवान के कार्य में समर्पित और संगठित भक्त ही विजय के भागी बनते हैं।

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