सुन्दर काण्ड चौपाई (387-398)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 387-398 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।

सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।

मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।।

जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।

करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।

बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

भावार्थ (सरल अर्थ)

जब शुक और धारण ( रावण के गुप्तचर)ने सभा में रामजी की महिमा कहकर रावण को समझाया तो रावण हँस पड़ा, सबको सुनाते हुए बोला – “यह तो कोई छोटा तपस्वी  है जो मेरे बगीचे में उपद्रव कर गया।

गुप्तचरों ने फिर समझाया – “हे नाथ! मेरी सारी बातें सत्य हैं। अभिमान छोड़कर सोचिए।

रामजी अत्यंत कोमल स्वभाव वाले हैं, यद्यपि वे सम्पूर्ण लोक के स्वामी हैं।

यदि आप सीता जी को लौटा दें तो भगवान राम आप पर दया करेंगे और आपके अपराध क्षमा कर देंगे।”

परंतु जब गुप्तचरों ने कहा — “सीता जी को श्रीराम को वापस कर दीजिए” — तब रावण ने क्रोध में आकर गुप्तचरों को पैर से मारा।

दोनों गुप्तचर, रावण के चरणों में सिर झुकाया और वहाँ से चल पड़े जहाँ करुणासागर श्रीराम थे।

रामजी के चरणों में प्रणाम कर उन्होंने अपनी सारी कथा सुनाई।

श्रीराम की कृपा से उन्होंने अपनी उचित स्थिति प्राप्त की।

वास्तव में वे मुनि अगस्त्य के शाप से  वे राक्षस बने थे।

रामजी की भक्ति से उन्होंने बार-बार चरणों को नमस्कार किया और अपने आश्रम की ओर लौट गए।

🌻 विस्तृत विवेचन

1. गुप्तचरों का विवेक और धर्मनिष्ठा:

इस प्रसंग में गुप्तचर, रावण को धर्म का उपदेश देते हैं। वे उसे विनम्रता से कहते हैं कि राम किसी साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं विष्णु हैं। यदि तुम सीता जी को लौटा दो तो वे तुम्हारे सभी अपराध क्षमा कर देंगे।

2. रावण का अहंकार और विनाश का आरम्भ:

रावण अपने अहंकार में गुप्तचर की बातों का मज़ाक उड़ाता है और उसे अपमानित करता है। यही उसका पतन शुरू होने का क्षण है।

गुप्तचर अंत में  रावण का साथ छोड़ श्रीराम की शरण में जाते हैं।

3. गुप्तचरों की शरणागति:

रावण से अपमानित होकर भी गुप्तचरों ने क्रोध नहीं किया। वे शांत चित्त से भगवान राम के पास पहुँचे और अपने मन की सारी बातें कहकर शरण लीं।

यह दर्शाता है कि भक्ति और विनम्रता से कोई भी पापी मुक्त हो सकता है।

4. आध्यात्मिक अर्थ:

रावण अहंकार का प्रतीक है और गुप्तचर विवेक का।

जब विवेक अहंकार से अलग होकर भगवान की शरण में आता है, तब जीवन में सच्ची शांति और मुक्ति मिलती है।





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चौपाई का सार यही है —

👉 “जो अभिमान छोड़कर भगवान की शर

ण में आता है, उसके सारे पाप मिट जाते हैं।”

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