सुन्दर काण्ड दोहा (49)

 सुन्दर काण्ड दोहा 49 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

भावार्थ

पहला पैरा (49क) — रावण का क्रोध अग्नि जैसा तीव्र है और उसके श्वास (स्वास) में भी धरती हिला देने वाली हवा सी प्रचंडता है। बिभीषण जलते—झुलसते (दुःख/भय से) हुआ भी था, पर रघुनाथ ने उसे सम्पूर्ण (अखण्ड) सुरक्षित रखा।

दूसरा पैरा (49ख) — वही संपत्ति और बल जो शिव ने रावण को दिये थे (दस माथे वगैरह के रूप में शक्ति/वैभव), वही रघुनाथ ने (बिन झिझक) बिभीषण को दे दिया — यानी राम ने उसे सम्मान, अधिकार और सुरक्षा दे दी।

विस्तृत विवेचन

1. प्रतीकात्मक चित्रण — रावण बनाम राम: यहाँ रावण की हिंसक प्रवृत्ति को अग्नि और उस अग्नि में फूँकने वाली प्रचंड हवा से बताया गया है — यह दर्शाता है कि रावण का क्रोध विनाशकारी और नियंत्रित नहीं था। इसके उलट राम की छवि संरक्षणकर्ता और क्षमाशील नेता की है जो संकट में पड़ी आत्मा को संजोकर रखता है।

2. बिभीषण की दशा — “जरत” शब्द से बिभीषण की मानसिक/आत्मिक पीड़ा और पराजय का भाव मिलता है — वह जल रहा है (हानीयुक्त स्थिति, अपमान या भय)। परन्तु “राखेउ दीन्हेहु राजु अखण्ड” से संकेत मिलता है कि राम ने उसकी सारी तुष्टि, भय और कलंक को दूर कर उसे सुरक्षित (पूरे सम्मान के साथ) अपने पास रखा — यानी दया और न्याय ने उसे बचाया।

3. शक्ति बनाम धर्म — 49(ख) में कहा गया कि जो वैभव (संपत्ति/बल) रावण को शिवादि से मिला था, वह बाह्य शक्ति थी; पर रघुनाथ ने वही (या उससे बड़ा) वैभव—राष्ट्र, सम्मान और राज—बिन किसी कंजूसी के बिभीषण को दे दिया। यह दिखाता है कि सच्ची महत्ता शक्ति के भौतिक भण्डार में नहीं, बल्कि धर्म, करुणा और लोकहित में है।

4. नैतिक शिक्षा — कविता पाठ से सिख मिलता है: क्रोध और अहंकार विनाश करते हैं; पर जो धर्म और दया के साथ कार्य करता है, वह संकट में पड़े जीवों को उठाकर आगे बढ़ाता है। रघुनाथ का व्यवहार आदर्श नेतृत्व और शुद्ध नीति का उदाहरण है — जो भी सत्य और धर्म की आह्वान करे, उसे संरक्षण और अधिकार मिलता है।

5. संदर्भात्मक निहितार्थ — यह दोहा हमें बताता है कि वीरता/बल केवल इकठ्ठा करने से नहीं आती; उसे सही कारण के लिये, नैतिक दृष्टि से खर्च करना ही verdadera महानता है। रावण के पास शक्तियाँ थी पर उपयोग पापी था; राम के पास दया और धर्म था — इसलिए उसने बिभीषण को बिना झिझक अपना समर्थन और राज्य दिया।

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