सुन्दर काण्ड चौपाई (304-310)
सुन्दर काण्ड चौपाई 304-310 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
❖ चौपाई 1:
"तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।
लोभ मोह मच्छर मद माना।।"
➤ भावार्थ:
जब तक श्रीराम हृदय में निवास नहीं करते, तब तक हृदय में तरह-तरह के दुष्ट (बुरे) विकार रहते हैं — जैसे लोभ, मोह, मद (अहंकार), माना (आत्मगौरव/गर्व)। ये सब हृदय को मलिन और दूषित करते हैं।
➤ विवेचन:
विभीषण जी कह रहे हैं कि जब तक भगवान का सच्चा निवास हृदय में नहीं होता, तब तक मनुष्य का हृदय बुरे गुणों से भरा रहता है। लोभ (लालच), मोह (आसक्ति), मद (अहंकार), और माना (स्वयं को श्रेष्ठ मानना) – ये सभी आत्मा को कलुषित कर देते हैं। यह विभीषण जी की आध्यात्मिक दृष्टि है जो आत्मा की शुद्धता में प्रभु की उपस्थिति को अनिवार्य मानती है।
❖ चौपाई 2:
"जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरें चाप सायक कटि भाथा।।"
➤ भावार्थ:
जब तक हृदय में वह रघुनाथ (श्रीराम) नहीं बसते, जो धनुष-बाण और तरकश धारण किए रहते हैं (अर्थात जो संसार के अनाचार का संहार करते हैं), तब तक हृदय पवित्र नहीं हो सकता।
➤ विवेचन:
यहाँ श्रीराम को एक संहारकर्ता रूप में प्रस्तुत किया गया है — जो अधर्म का नाश करते हैं। यदि ऐसा प्रभु हमारे अंतःकरण में नहीं बसते, तब तक हम अधर्म के वश में रहते हैं। यह बताता है कि केवल भक्ति नहीं, प्रभु की शक्ति और धर्म-रक्षा का भाव भी हृदय में होना चाहिए।
❖ चौपाई 3:
"ममता तरुन तमी अँधिआरी।
राग द्वेष उलूक सुखकारी।।"
➤ भावार्थ:
ममता रूपी घना अंधकार है और राग-द्वेष (आसक्ति और विरोध) उल्लू के समान हैं, जिन्हें यह अंधकार प्रिय लगता है।
➤ विवेचन:
ममता, यानी कि ‘मेरा’ और ‘तेरा’ का भाव, आत्मा को अंधकार में रखता है। राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) उसी अंधकार में पलते हैं — जैसे उल्लू को अंधेरा पसंद होता है, वैसे ही ये विकार अज्ञान के अंधकार में फलते-फूलते हैं। जब तक ममता और राग-द्वेष हैं, तब तक आत्मज्ञान संभव नहीं।
❖ चौपाई 4:
"तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।"
➤ भावार्थ:
जब तक प्रभु का प्रताप रूपी सूर्य मन में नहीं उदित होता, तब तक जीव के मन में ये अंधकार रूपी विकार निवास करते हैं।
➤ विवेचन:
प्रभु का प्रताप (महिमा) जब हृदय में प्रकाशित होता है, तभी अज्ञान और ममता का अंधकार दूर होता है। जैसे सूरज उगने से अंधकार भागता है, वैसे ही प्रभु की उपस्थिति से बुरे संस्कार मिटते हैं।
❖ चौपाई 5:
"अब मैं कुसल मिटे भय भारे।
देखि राम पद कमल तुम्हारे।।"
➤ भावार्थ:
अब मैं कुशल हूँ, मेरे भारी भय मिट गए हैं — क्योंकि मैंने तुम्हारे श्रीराम के चरणकमल देख लिए हैं।
➤ विवेचन:
विभीषण जी कहते हैं कि प्रभु के दर्शन मात्र से उनका सारा भय मिट गया। यह दिखाता है कि सच्चे श्रद्धा और भक्ति से जब कोई भक्त प्रभु को अनुभव करता है, तो वह सारे सांसारिक भयों से मुक्त हो जाता है।
❖ चौपाई 6:
"तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला।
ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।"
➤ भावार्थ:
आप (श्रीराम) कृपालु हैं। जिस पर आपकी कृपा हो जाती है, उसे जन्म, मरण और रोग जैसे तीनों प्रकार के भव (संसार) के दुःख नहीं व्यापते।
➤ विवेचन:
यहाँ विभीषण जी भगवद्-कृपा की महिमा का वर्णन करते हैं। तीन प्रकार के दुःख — आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक — सब प्रभु की कृपा से समाप्त हो जाते हैं। प्रभु की कृपा ही जीवन को मुक्त करती है।
❖ चौपाई 7:
"मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ।
सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।"
➤ भावार्थ:
मैं राक्षस (निसिचर) हूँ, अत्यंत अधम स्वभाव का हूँ। मैंने कोई भी शुभ आचरण कभी नहीं किया।
➤ विवेचन:
विभीषण जी कहते हैं कि राक्षस कुल में जन्म लेने का पश्चाताप है। वे मानते हैं कि उन्होंने कोई पुण्य कर्म नहीं किया, फिर भी प्रभु की शरण में आए हैं। यह शरणागति का चरम उदाहरण है — जहाँ भक्त अपने दोष स्वीकार कर प्रभु से कृपा की याचना करता है।
❖ चौपाई 8:
"जासु रूप मुनि ध्यान न आवा।
तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।"
➤ भावार्थ:
जिस प्रभु के रूप का ध्यान तक मुनियों के लिए कठिन है, उसी प्रभु ने मुझ अधम को हर्षपूर्वक अपने हृदय से लगा लिया।
➤ विवेचन:
यहां विभीषण की विनम्रता और आश्चर्य का भाव है — कि इतने महान भगवान, जिनके स्वरूप का ध्यान तक ऋषि-मुनियों को सहज नहीं होता, उन्होंने मुझे स्वीकार कर लिया। यह भक्ति की महिमा है — जहाँ जाति, कर्म, कुल, योग्यता कुछ भी नहीं देखी जाती, केवल प्रेम और समर्पण देखा जाता है।
✦ समग्र सारांश:
यह चौपाईयों की शृंखला विभीषण की शरणागति और प्रभु श्रीराम की अनंत करुणा और भक्ति की महिमा को दर्शाती है। जब तक हृदय में राम नहीं होते, तब तक विकार निवास करते हैं। परंतु जैसे ही राम का प्रकाश होता है, भय, मोह, लोभ, राग-द्वेष — सब समाप्त हो जाते हैं।
भक्त अपने दोष स्वीकार करके भी जब प्रभु की शरण में आता है, तो भगवान बिना भेदभाव के उसे अपनाते हैं। यही रामचरितमानस का मर्म है — "भव भय हरन राम धनु धारी"।
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