सुन्दर काण्ड चौपाई (296-303)
सुन्दर काण्ड चौपाई 296-303 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया
।।
भावार्थ :
जब विभीषण जी ने प्रभु श्रीराम को प्रणाम किया, तब प्रभु अत्यंत प्रसन्न होकर उठे और उन्होंने अपने विशाल भुजाओं में उन्हें भर लिया। प्रभु ने उन्हें लक्ष्मण सहित पास बैठाया और प्रेमपूर्वक पूछा — “हे लंकेश! तुम और तुम्हारा परिवार कुशल तो हैं? तुम तो राक्षसों की सभा में रहते हो, वहाँ धर्मपालन कैसे संभव है?”
श्रीराम आगे कहते हैं कि — “मैं तुम्हारा स्वभाव जानता हूँ, तुम नीति में निपुण और न्यायप्रिय हो, परंतु दुष्टों की संगति से कभी कल्याण नहीं होता। नरक में रहना भी अच्छा है, पर दुष्टों का साथ नहीं होना चाहिए। अब तुम मेरे शरण में आए हो, यह जानकर मुझे बड़ा आनंद हुआ।”
विवेचन :
इस चौपाई में भगवान श्रीराम और विभीषण मिलन का अत्यंत मार्मिक और भक्तिपूर्ण दृश्य प्रस्तुत किया गया है।
1. प्रेम और करुणा का भाव: प्रभु श्रीराम ने दीन भाव से आए विभीषण को बिना किसी संदेह के हृदय से लगा लिया। इससे उनकी करुणामयता और भक्तवत्सल स्वभाव झलकता है।
2. संगति का महत्व: भगवान समझाते हैं कि दुष्टों की संगति में रहकर भी सज्जनता टिक नहीं सकती। अतः सच्चे धर्मपालन के लिए सद्जनों की संगति आवश्यक है।
निष्कर्ष:
इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर के शरणागत होने पर हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी कुल या समाज का क्यों न हो, प्रभु की कृपा का अधिकारी बनता है। साथ ही, यह भी सिखाता है कि दुष्टों की संगति से दूर रहना ही सच्चे धर्म का पालन है।
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