सुन्दर काण्ड चौपाई (399-406)
सुन्दर काण्ड चौपाई 399-406 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई
लछिमन बान सरासन आनू।
सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती।
सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी।
अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा।
ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा।
यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला।
उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने।
जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना।
बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में उस प्रसंग से संबंधित है जब भगवान श्रीराम समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करते हैं, परंतु जब तीन दिन तक भी समुद्र नहीं मानता, तब श्रीराम क्रोधित होकर उसे सुखाने का निश्चय करते हैं। इस चौपाई में भगवान का धैर्य, नीति और धर्म-भावना स्पष्ट झलकती है।
भावार्थ
जब सागर ने श्रीराम की विनती नहीं मानी, तब श्रीराम ने कहा — “लक्ष्मण! धनुष और बाण लाओ। अब इस जल को बाणों की अग्नि से सुखा दूँगा।”
भगवान कहते हैं कि —
मूर्ख के साथ विनम्रता,
कपटी के साथ प्रेम,
कंजूस के साथ सुंदर नीति,
मोह में डूबे व्यक्ति को ज्ञान,
लोभी को वैराग्य की बात,
और क्रोधी या कामी को भगवान की कथा —
ये सब बातें व्यर्थ हैं, जैसे ऊसर भूमि (बंजर ज़मीन) में बीज बोने से फल नहीं मिलता।
इस प्रकार कहकर भगवान ने धनुष पर बाण चढ़ाया।
यह देखकर लक्ष्मण जी को यह नीति बहुत प्रिय लगी।
जब प्रभु ने बाण संधान किया, तो समुद्र के हृदय में अग्नि उत्पन्न हो गई।
मगर, मछलियाँ, साँप, मगर आदि जलचर घबरा गए।
सागर ने जब यह विनाश देखा, तो वह ब्राह्मण रूप में स्वर्ण थाल में रत्न भरकर श्रीराम के पास आया।
विवेचन
यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि —
1️⃣ धैर्य की सीमा भी होती है। जब विनम्रता काम न करे, तब नीति और कठोरता आवश्यक हो जाती है।
2️⃣ अधमों के साथ कोमलता व्यर्थ है। ऐसे लोगों को समझाने के लिए दंड नीति ही उचित है।
3️⃣ भगवान का यह रूप दिखाता है कि वे केवल करुणामय नहीं, बल्कि न्यायप्रिय भी हैं।
यहाँ सागर रूपी मूर्ख के प्रति श्रीराम का क्रोध वास्तव में धर्म-रक्षा के लिए था, न कि व्यक्तिगत अहंकार के कारण।
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