सुन्दर काण्ड चौपाई (369-376)
सुन्दर काण्ड चौपाई 369-376 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
भावार्थ (सरल भाषा में):
रावण के गुप्तचर रावण से कहते हैं — हे राक्षसराज! ये सभी वानर राजा सुग्रीव के समान ही बलवान हैं। इनके समान करोड़ों वानर हैं, जिन्हें गिनना असंभव है। श्रीराम की कृपा से इन सबके बल की कोई सीमा नहीं है; उनके लिए यह तीनों लोक तिनके समान तुच्छ हैं।
मैंने सुना है कि इनके अठारह पद्म (असंख्य) समूह हैं, और उनमें एक भी वानर ऐसा नहीं है जो युद्ध में तुमको न जीत सके। यदि श्रीराम आज्ञा दें तो ये सब वानर क्रोध में आकर अपने हाथों से सागर को सोख लें, मछलियों और नागों समेत। और यदि चाहें तो पर्वतों को फेंककर सागर को भर दें।
वे सब मिलकर आपके सिरों को मसल कर धूल में मिला दें — ऐसी ही बातें सभी वानर आपस में कहते हैं। वे बिना किसी भय के गर्जना करते और लंका को निगल जाने जैसी भंगिमा बनाते हैं।
विस्तृत विवेचन:
इस प्रसंग में गुप्तचर रावण को चेतावनी देते हैं कि जिन वानरों की सेना को वे तुच्छ समझ रहे हैं, वास्तव में वे सब श्रीराम की कृपा से अतुल बलवान हैं। श्रीराम का प्रसाद मिल जाने पर सबसे छोटा जीव भी अपार शक्ति प्राप्त कर लेता है।
गुप्तचर यहाँ श्रीराम के नाम और कृपा की महिमा दिखा रहे हैं — वे बताते हैं कि प्रभु की कृपा से सीमित जीव भी असंभव कार्य कर सकता है। साथ ही यह भी संकेत है कि अहंकार से भरे रावण का विनाश निश्चित है, क्योंकि उसके सामने ऐसी सेना है जो प्रभु के आदेश से समुद्र सुखा या भर सकती है।
इस प्रकार यह चौपाई भक्त और ईश्वर के संबंध का आदर्श उदाहरण है — "राम कृपा बिना कुछु नाहीं।"
गुप्तचर का उद्देश्य रावण को सचेत करना और श्रीराम की महिमा प्रकट करना दोनों है।
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