सुन्दर काण्ड दोहा (44)
सुन्दर काण्ड दोहा 44 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा –
"उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।"
भावार्थ –
श्रीराम करुणा के धाम (कृपानिकेत) ने हँसकर कहा –
"उसे (विभीषण को) दोनों ही प्रकार से, चाहे मित्र के रूप में या शत्रु के रूप में, ले आओ।"
फिर "जय हो कृपालु प्रभु की" ऐसा कहकर अंगद और हनुमान जी समेत सब वानर विभीषण को लेने चल पड़े।
विवेचन –
1. इस प्रसंग में विभीषण, जो कि रावण का भाई था, अपने कुल और बंधु-जन छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में आ रहा है। सुग्रीव और अन्य वानरों को आशंका थी कि कहीं वह दूत बनकर छल तो नहीं कर रहा।
लेकिन श्रीराम जी करुणा के सागर हैं, वे सबका भला चाहते हैं। इसलिए वे मुस्कराकर कहते हैं –
"वह चाहे शत्रु बनकर आया हो या सच्चे भाव से मित्र बनकर आया हो, उसे लाओ।"
2. यहाँ भगवान राम का दिव्य गुण प्रकट होता है – शरणागत वत्सलता।
उनका वचन है कि जो कोई भी शरण में आता है, चाहे उसका स्वभाव कैसा भी क्यों न हो, प्रभु उसे स्वीकार करते हैं।
यह भक्तों के लिए विश्वास का आधार है कि भगवान से मिलने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है।
3. "जय कृपाल" का उद्घोष भक्तों की आस्था और उत्साह को दिखाता है। अंगद, हनुमान आदि प्रभु की आज्ञा पाकर हर्षित होकर विभीषण को बुलाने जाते हैं।
👉 सार यह है कि इस दोहे में श्रीराम की करुणा, उदारता और शरणागत वत्सलता का अद्भुत दर्शन होता है।
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