सुन्दर काण्ड चौपाई (337-344)
सुन्दर काण्ड चौपाई 337-344 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
भावार्थ:
विभीषण जी के सुझाव पर राम जी ने कहा — “हे सखा! उपाय तो तुम्हारा बहुत अच्छा है" भगवान श्री राम को यह मत अच्छा लगा।
पर यह विचार लक्ष्मण जी को पसंद नहीं आया कि यदि दैव (भाग्य) सहायता करे तो ही यह कार्य सफल होगा।”
उन्होंने कहा — “दैव के भरोसे कुछ नहीं होता, पुरुष को अपने कर्म पर विश्वास रखना चाहिए। जो व्यक्ति हर बात में ‘दैव-दैव’ कहकर बैठा रहता है, वह आलसी होता है।”
राम जी ने लछ्मण को समझाया कि “धैर्य रखो, हम प्रयत्न करेंगे।” इतना कहकर वे समुद्र तट पर गए, पहले सिर झुकाकर प्रणाम किया और कुशा बिछाकर बैठ गए।
जब विभीषण जी भगवान से मिलने आए, उनके पीछे रावण ने अपने दूत भेजे थे।
विस्तृत विवेचन:
इस चौपाई में कर्म और दैव (भाग्य) के सिद्धांत पर गहरी शिक्षा दी गई है।
राम जी को विभीषण का मत अच्छा लगा कि दैव की कृपा से कार्य सफल होता है, पर लक्ष्मण का मत था कि दैव भी उसी की सहायता करता है जो पुरुषार्थ करता है।
लक्ष्मण जी ने कहा कि आलसी व्यक्ति अपने कर्म का त्याग कर “दैव-दैव” पुकारता रहता है, पर कर्मवीर व्यक्ति कभी भाग्य पर नहीं टिकता, वह अपने प्रयास से ही सफलता प्राप्त करता है।
इसके बाद राम जी समुद्र के पास जाकर शांति और धैर्य से मार्ग पाने का उपाय करने लगे।
इस प्रसंग से यह संदेश मिलता है कि भाग्य से अधिक बल कर्म का होता है, और भगवान स्वयं कर्म करने की प्रेरणा देते हैं।
Comments
Post a Comment