सुन्दर काण्ड चौपाई (319-328)
सुन्दर काण्ड चौपाई 319-328 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
यह चौपाई “सुन्दरकाण्ड” में आती है, जहाँ भगवान श्रीराम और विभीषण के बीच अत्यंत भावनात्मक संवाद होता है। आइए पहले इसका भावार्थ और फिर विस्तृत विवेचन समझते हैं —
भावार्थ:
श्रीराम कहते हैं — “हे लंकेश (विभीषण)! तुममें सब उत्तम गुण हैं, इसलिए तुम मुझे बहुत प्रिय हो।“ यह सुनकर सब वानर ‘जय-जय’ बोलने लगे। विभीषण श्रीराम के वचनों को अमृत के समान पाकर बार-बार उनके चरणों में झुकते हैं, किंतु उनके हृदय में जो पहले थोड़ी-सी सांसारिक वासना थी, वह अब प्रभु के प्रेम की धारा में बह गई। विभीषण श्रीराम से कहते हैं — “हे देव! आप समस्त चराचर के स्वामी हैं, शरणागतों के रक्षक हैं, सबके अंतःकरण को जानने वाले हैं। अब आप कृपा करके मुझे ऐसी भगवती भक्ति दें जो सदा भगवान शंकर को भी प्रिय हो।”
श्रीराम ने कहा – “एवमस्तु” (ऐसा ही हो)। फिर तुरंत उन्होंने सागर से पानी माँगने के लिए कहा। राम बोले – “यद्यपि मित्र, यह तुम्हारी इच्छा नहीं थी, फिर भी मेरा वचन कभी व्यर्थ नहीं होता।” यह कहकर श्रीराम ने विभीषण का राज्याभिषेक किया और आकाश में पुष्प-वृष्टि होने लगी।
विस्तृत विवेचन:
इस प्रसंग में श्रीराम का भक्तवत्सल और दयालु स्वभाव प्रकट होता है।
1. विभीषण की भक्ति और विनम्रता:
जब विभीषण श्रीराम की शरण में आए, तब उन्होंने कोई राज्य या वैभव नहीं माँगा, केवल प्रभु की भक्ति माँगी। इससे उनका निर्मल और सच्चा भक्त हृदय झलकता है।
2. श्रीराम की कृपा और स्नेह:
श्रीराम कहते हैं कि “तुम मुझे इसलिए प्रिय हो क्योंकि तुममें सब गुण हैं।” यह वचन इस बात को सिद्ध करता है कि ईश्वर केवल भक्त के गुण, सत्यता और भक्ति भाव को देखते हैं, न कि उसका रूप, जाति या जन्मस्थान।
3. हृदय परिवर्तन का संकेत:
“उर कछु प्रथम बासना रही” — विभीषण के मन में थोड़ी सांसारिक वासना पहले थी, परंतु प्रभु के सान्निध्य में आते ही वह प्रेम-सरोवर में विलीन हो गई। यह बताता है कि प्रभु संग से मनुष्य का अंतःकरण स्वतः पवित्र हो जाता है।
4. शरणागत की पूर्ण स्वीकृति:
श्रीराम का “एवमस्तु” कहना यह दिखाता है कि जो भक्त प्रेम और समर्पण से शरण में आता है, प्रभु उसकी हर अभिलाषा पूर्ण करते हैं।
5. आकाशीय पुष्पवृष्टि:
यह प्रसंग यह दर्शाता है कि जब सच्चे भक्त को ईश्वर स्वीकारते हैं, तो संपूर्ण प्रकृति भी आनंदित हो उठती है।
✨ सारांश:
यह चौपाई विभीषण की भक्ति, विनम्रता और प्रभु-प्रेम का अमर उदाहरण है। श्रीराम के वचन यहाँ यह सिखाते हैं कि भगवान को प्रिय वही होता है, जिसमें सद्गुण,
सत्य और निष्कपट भक्ति होती है।
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