सुन्दर काण्ड दोहा (50)

 सुन्दर काण्ड दोहा 50 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा –

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।

बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

भावार्थ :

विभीषण जी भगवान श्रीराम से कहते हैं — "प्रभु! समुद्र आपके कुलगुरु (पूर्वजों के गुरु) हैं, वे विचार करके स्वयं ही कोई उपाय बताएंगे। तब बिना अधिक प्रयास के, सभी वानर और भालू सेना सहित आप समुद्र पार कर सकेंगे।"

विस्तृत विवेचन :

इस दोहे में विभीषण जी का सौम्य, विनम्र और विवेकपूर्ण स्वभाव प्रकट होता है। जब समुद्र पार करने का उपाय खोजा जा रहा था, तब विभीषण भगवान श्रीराम को सलाह देते हैं कि —

सागर आपके कुलगुरु (पूर्वजों के गुरु) हैं, क्योंकि सगर के पुत्रों ने सागर का निर्माण किया था, इसलिए सागर आपका कुल संबंधी हुआ।

इस नाते वे अवश्य ही आपकी प्रार्थना का मान रखेंगे और उचित उपाय बताएंगे जिससे वानर-भालु सेना को कष्ट न हो।

यहाँ विभीषण जी यह भी संकेत करते हैं कि —

विनम्रता और धर्मयुक्त संवाद बल प्रयोग से श्रेष्ठ है।

प्रभु का कार्य भले ही पराक्रम से सिद्ध हो, परंतु विनय और नीति का स्थान सर्वोपरि है।

सारांश :

यह दोहा विनम्रता, विवेक और नीति की महिमा का बोध कराता है। विभीषण बताते हैं कि यदि हम संवाद और सद्भाव से कार्य करें, तो कठिन से कठिन कार्य भी सहज हो जाते हैं।

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