सुन्दर काण्ड चौपाई (311-318)
सुन्दर काण्ड चौपाई 311-318 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में तब आती है जब भगवान श्रीराम विभीषण जी से कहते हैं कि — जो भी जीव (चाहे कितना भी पापी या द्रोही क्यों न हो) यदि मेरे शरण में आ जाता है, तो मैं उसे अपने समान मानता हूँ। अब विस्तार से समझिए 👇
भावार्थ (सरल अर्थ):
हे सखा (विभीषण जी)! मेरा स्वभाव सुनो — जैसा कि काकभुशुण्डि, भगवान शंकर और पार्वती जी जानते हैं —
यदि कोई मनुष्य, जो पहले सबका शत्रु रहा हो, मेरे शरण में भयभीत होकर आ जाए,
और अहंकार, मोह, कपट आदि छोड़ दे, तो मैं उसी क्षण उसे साधु के समान मान लेता हूँ।
जो व्यक्ति माता-पिता, भाई, पत्नी, पुत्र, धन-संपत्ति, घर और मित्रों से ममता का तागा (बंधन) समेटकर,
अपने मन को मेरे चरणों में स्थिर कर देता है,
जो समदर्शी है, जिसकी कोई इच्छा नहीं, जिसे न हर्ष होता है, न शोक, न भय —
ऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसा ही बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है।
हे विभीषण आपके समान संत मुझे अत्यंत प्रिय हैं; मैं अन्य किसी को इतनी प्रीति नहीं करता।
विस्तृत विवेचन:
1. शरणागति का महत्त्व:
भगवान श्रीराम बताते हैं कि जो भी अहंकार, मोह और पाखंड छोड़कर सच्चे मन से शरण में आता है, वह चाहे कितना भी अपराधी क्यों न रहा हो, भगवान उसे साधु बना देते हैं।
👉 इसका उदाहरण “विभीषण” हैं — रावण का भाई होकर भी जब भगवान की शरण आया, तो श्रीराम ने बिना संदेह उसे स्वीकार किया।
2. सच्चे भक्त के लक्षण:
जिसे संसार के किसी भी संबंध में ममता नहीं रहती।
जिसका मन हर परिस्थिति में समान रहता है।
जो सुख-दुख, हर्ष-शोक से परे है।
जो केवल भगवान के चरणों में मन लगाता है।
3. भगवान की भक्ति का फल:
ऐसा भक्त भगवान के हृदय में उसी प्रकार बसता है जैसे लोभी के मन में धन बसता है — अर्थात सदैव, गहराई से और बिना विराम के।
4. संतों के प्रति भगवान का प्रेम:
भगवान अंत में कहते हैं — “हे विभीषण! आप जैसे संत मेरे लिए अत्यंत प्रिय हैं; मैं आपके समान किसी और को नहीं मानता।”
इसका अर्थ है कि सच्चे भक्त और संत भगवान के अपने हृदय के अति निकट रहते हैं।
सारांश:
➡ यह चौपाई भगवान श्रीराम के अनंत करुणा, शरणागति स्वीकार करने वाले स्वभाव और संत-भक्तों के प्रति असीम प्रेम का वर्णन करती है।
➡ भगवान के लिए जन्म, कुल, पाप या अपराध कुछ मायने नहीं रखते — केवल सच्ची शरण और निष्कपट भक्ति ही मायने रखती है।
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