सुन्दर काण्ड दोहा (47)

 सुन्दर काण्ड दोहा 47 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा –

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।

देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

भावार्थ :

विभीषण जी अत्यंत प्रसन्न होकर कहते हैं — “अहो! मेरा तो अपरंपार सौभाग्य है कि श्रीरामचन्द्रजी की असीम कृपा से मेरे नेत्रों को वे कमल के समान चरण देखने का अवसर मिला, जिनकी पूजा स्वयं ब्रह्मा और शंकर भी करते हैं।”

अर्थात विभीषण जी को अपने भाग्य पर गर्व है कि उन्होंने उन चरणों का दर्शन किया, जो समस्त देवताओं के वंदनीय हैं।

विस्तृत विवेचन :

यह दोहा सुन्दरकाण्ड में तब आता है जब विभीषण जी रावण और लंका को छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में आते हैं और प्रभु श्रीराम के चरणों का दर्शन करते हैं।

इस दोहे में विभीषण की भक्ति, विनम्रता और आनंद का अद्भुत चित्रण है।

1. भक्ति और विनम्रता का भाव:

विभीषण जी अपने कार्य की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि यह मानते हैं कि सब कुछ प्रभु श्रीराम की कृपा से ही संभव हुआ। वे अपने सौभाग्य को श्रीराम की कृपा का परिणाम बताते हैं।

2. भगवद् चरणों की महिमा:

श्रीराम के चरण स्वयं ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) और शिव (संहारक) तक के पूज्य हैं। उन चरणों का प्रत्यक्ष दर्शन हनुमानजी के लिए अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य है।

इससे भक्ति की वह पराकाष्ठा झलकती है जहाँ भक्त अपने ईश्वर के चरणों में ही परम सुख का अनुभव करता है।

निष्कर्ष :

इस दोहे में तुलसीदासजी ने विभीषण जी की शरणागत भक्ति, नम्रता और प्रभु कृपा के प्रभाव को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है।

विभीषण जी के लिए श्रीराम के चरण ही समस्त सुखों का स्रोत हैं — यही इस दोहे का सार है।

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