सुन्दर काण्ड दोहा (45)

 सुन्दर काण्ड दोहा 45 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

जब विभीषण जी भगवान राम से मिले तब उन्होंने भगवान राम से कहा 

भावार्थ

हे प्रभु! आपके सुंदर यश और गुणों को सुनकर मैं आपके चरणों में आया हूँ। आप तो संसार-रूपी भय का नाश करने वाले हैं। मेरी "त्राहि-त्राहि" (रक्षा की पुकार) सुनकर मेरी सारी विपत्ति हर लीजिए, क्योंकि आप ही दुखों का हरण करने वाले और शरणागत को सुख देने वाले श्रीरघुनाथ हैं।

विस्तृत विवेचन

1. श्रवण सुजसु सुनि आयउँ – विभीषण कहते हैं कि मैंने आपका यश, गुण, और चरित्र सुना। रामचरितमानस में बार-बार यही दिखाया गया है कि भगवान की महिमा सुनकर ही साधक के भीतर श्रद्धा और भक्ति का बीज अंकुरित होता है।

2. भंजन भव भीर – संसार दुःखों और भय से भरा है। यह भवसागर (जन्म-मरण का चक्र) बड़ा कठिन है। श्रीराम "भवभीति" का नाश करने वाले हैं। अतः जब मनुष्य उन पर विश्वास करता है तो उसे निर्भयता और आत्मिक शांति मिलती है।

3. त्राहि त्राहि आरति हरन – यहाँ विभीषण की "हृदय की पुकार" झलकती है। जैसे बच्चा संकट में माँ को पुकारता है, वैसे ही विभीषण भगवान राम से विनती करतें हैं– "हे राम! मेरी विपत्ति हर लो।" यह पुकार आत्मसमर्पण की प्रतीक है।

4. सरन सुखद रघुबीर – श्रीराम सच्चे आश्रयदाता हैं। जो भी उनकी शरण में आता है, उसे न केवल दुःखों से मुक्ति मिलती है, बल्कि शाश्वत सुख की प्राप्ति भी होती है।

आध्यात्मिक संदेश

प्रभु तक पहुँचने का मार्ग "श्रवण" से खुलता है — जब हम प्रभु के गुण, कथा और चरित्र सुनते हैं तो भक्ति का भाव जगता है।

संकट और भय में सच्चा सहारा केवल भगवान हैं। जब मनुष्य पूर्ण समर्पण के साथ "त्राहि त्राहि" पुकारता है, तो भगवान अवश्य रक्षा करते हैं।

यह दोहा

 शरणागति और भक्ति की चरम अभिव्यक्ति है।

Comments

Popular posts from this blog

सुन्दर काण्ड (चौपाई 15-16)

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

सुन्दर काण्ड चौपाई (195-204)