सुन्दर काण्ड चौपाई (289-296)
सुन्दर काण्ड चौपाई 289-296 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
भावार्थ
हनुमानजी ने बिभीषण को सम्मानपूर्वक आगे चलने के लिए कहा और वे प्रभु श्रीराम के पास आ पहुँचे।
दूर से ही बिभीषण ने राम और लक्ष्मण के दर्शन किए, जिनकी छवि ने उनकी आँखों को आनन्द से भर दिया।
राम का सौंदर्य देखकर वे ठिठककर क्षणभर एकटक निहारते रह गए। उनके लंबे भुजाएँ, लाल कमल जैसे नेत्र, श्याम शरीर और भक्तों के भय का नाश करने वाले स्वरूप देखकर वे मुग्ध हो गए।
सिंह के समान चौड़े कंधे, विस्तृत वक्षस्थल और मोहक मुखमंडल ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु उमड़ पड़े और रोम-रोम पुलकित हो उठा।
मन को स्थिर करके उन्होंने धीरे-धीरे मधुर वाणी में कहा –
“हे प्रभु! मैं रावण का भाई हूँ। राक्षसकुल में जन्मा हूँ, पर आप देवताओं के रक्षक हैं। यह मेरा तामस शरीर सहज ही पापों में प्रवृत्त है, जैसे उल्लू को अंधकार में ही प्रेम होता है।”
विस्तृत विवेचन
1. बिभीषण का राम से मिलन –
जब हनुमान बिभीषण को लेकर आए तो वे सीधे प्रभु श्रीराम के चरणों तक पहुँचे। बिभीषण के मन में प्रभु के दिव्य सौंदर्य का दर्शन होते ही भक्ति और भाव का समुद्र उमड़ पड़ा। तुलसीदासजी ने यहाँ राम के सौंदर्य का अत्यंत कोमल और भावपूर्ण चित्रण किया है।
2. राम का दिव्य रूप –
प्रभु राम की लंबी भुजाएँ, रक्त कमल के समान नेत्र, श्याम शरीर और सिंह के समान बलवान कंधे देखकर बिभीषण मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। यह वर्णन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि राम के दिव्य, करुणामय और भय निवारक स्वरूप को भी प्रकट करता है।
3. भक्ति का उत्कर्ष –
रामदर्शन पाकर बिभीषण का शरीर पुलकित हो उठता है, नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगते हैं। यही सच्ची भक्ति की पहचान है— जब ईश्वर का स्मरण मात्र भी हृदय को द्रवित कर दे।
4. विनय और आत्मस्वीकार –
बिभीषण अत्यंत विनम्रता से अपना परिचय देते हैं— “मैं रावण का भाई हूँ, राक्षसवंश में जन्मा हूँ, परंतु सहज पापप्रिय इस तामस देह से मुझे घृणा है। जैसे उल्लू को अंधकार में प्रेम होता है, वैसे ही राक्षस पापों में ही रमता है।”
यहाँ वे अपनी दोषपूर्ण पृष्ठभूमि छिपाते नहीं, बल्कि सच्चाई से स्वीकार करते हैं। यही आत्मसमर्पण का भाव है।
5. आध्यात्मिक संकेत –
यह प्रसंग बताता है कि जन्म किसी कुल या जाति में होने से मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि भगवान की शरणागति ही श्रेष्ठ है। बिभीषण का राम के चरणों में आत्मसमर्पण इस सत्य को प्रतिपादित करता है
👉 निष्कर्ष –
यह चौपाई बिभीषण की विनम्रता, सच्ची भक्ति और भगवान राम के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण को प्रकट करती है। साथ ही यह दर्शाती है कि ईश्वर के स्वरूप का दर्शन भक्त के हृदय में भक्ति, प्रेम और करुणा की धारा प्रवाहित कर देता है।
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