सुन्दर काण्ड चौपाई (353-360)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 352-360 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई —

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।

कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।

पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।

कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।

भावार्थ :

रावण के दूत (गुप्तचर)लंकापति रावण के दरबार में पहुँचते हैं। वे पहले लक्ष्मणजी के चरणों में प्रणाम करके श्रीराम के गुणों का गान करते हुए लंका आते हैं। वहाँ पहुँचकर रावण के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं।

रावण हँसते हुए उनसे विभीषण के बारे में पूछता है और कहता उसकी मृत्यु निकट आ गई है, वरना लंका राज्य को छोड़कर भगवान श्रीराम की शरण में नहीं जाता। जिस तरह कीट पतंग की मृत्यु आती है।

फिर वह कहता है — “भालू और वानरों की सेना के बारे में बताओ जो कठिन काल से प्रेरित होकर यहां आया है, जिसका रखवाला समुद्र से प्रार्थना कर रहा है।

अंत में कहता है — " उस तपस्वी राम और लक्ष्मण के बारे में बताओ, जिसके हृदय में मेरा डर समाया हुआ है "

विवेचन :

इस चौपाई में तुलसीदासजी ने रावण के अहंकार और रावण के दूत की बुद्धिमत्ता का अद्भुत चित्रण किया है।

1. रावण के दूत का कार्य — वे मर्यादित रूप में पहले प्रणाम करते हैं और संदेश देने का कार्य निभाते हैं।

2. रावण का अहंकार और विनाश का संकेत — रावण की हँसी उसके अहंकार का प्रतीक है।

इस प्रकार यह प्रसंग धर्म और अधर्म, मर्यादा और अहंकार, तथा दैवी शक्ति और दानवी प्रवृत्ति के टकराव का सूचक है।

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