सुन्दर काण्ड चौपाई (407-413)
सुन्दर काण्ड चौपाई 407-413 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।
छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी।
इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए।
सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई।
सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही।
मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।
उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।
करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
भावार्थ (सरल अर्थ):
भयभीत होकर सागर प्रभु श्रीराम के चरण पकड़कर कहता है
“हे नाथ! मेरे सब अपराध क्षमा करें। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — ये पाँच तत्व स्वभाव से ही जड़ हैं। इन्हें आपने ही माया से सृष्टि-कार्य के लिए बनाया है। जिसको जैसा कार्य सौंपा है, वह उसी रूप में रहता है और वैसा ही सुख पाता है।
आपने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी। अब मेरी मर्यादा भी आपने ही रखी। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी — इन सबको ताड़ना (अनुशासन) का अधिकारी कहा गया है।
हे प्रभु! आपके प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और आपकी सेना पार उतर जाएगी, इसमें मेरा कोई गर्व नहीं। आप जैसा उचित समझें वैसा ही शीघ्र आदेश दें, मैं वैसा ही करूँगा।”
🔹 विस्तृत विवेचन:
1. सागर की विनम्रता:
सागर स्वयं को जड़ प्रकृति का अंग बताते हुए कहता है कि उसके स्वभाव में चलना या मार्ग देना उसके अपने वश में नहीं, यह तो प्रकृति का नियम है जिसे भगवान ने ही बनाया है।
2. भगवान की मर्यादा-स्थापना:
सागर यह भी कहता है कि प्रभु ने उसे शिक्षा देकर मर्यादा की रक्षा की — कि किसी भी जड़ या अज्ञानी को उचित मार्ग से ही चलाना चाहिए, कभी-कभी कठोरता आवश्यक होती है।
3. ‘ढोल गँवार…’ पंक्ति का अर्थ:
इसका भाव यह नहीं कि इन वर्गों का अपमान किया जाए, बल्कि यह कि जिन्हें ज्ञान या विवेक की समझ कम होती है, उन्हें अनुशासन से ही नियंत्रित करना पड़ता है। यह उस समय के सामाजिक संदर्भ का प्रतीक है।
4. सागर की निष्ठा:
सागर कहता है कि प्रभु की आज्ञा सर्वोपरि है। वह मार्ग बताने का प्रण करता है ताकि श्रीराम की सेना लंका पार कर सके।
🌺 शिक्षा:
➡️ सच्चा विनम्र वही है जो अपने दोषों को स्वीकार करे और ईश्वर से क्षमा माँगे।
➡️ भगवान की आज्ञा और मर्यादा का
पालन ही जीवन का सर्वोत्तम धर्म है।
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