सुन्दर काण्ड दोहा (46)

 सुन्दर काण्ड दोहा 46 का भावार्थ सहित विस्तृत 

विवेचन:

दोहा –

“तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।”

भावार्थ :

जब तक कोई जीव (मनुष्य) भगवान श्रीराम का भजन नहीं करता, तब तक वह सुख और शांति नहीं पा सकता। उसके जीवन में दुःख, चिंता और अशांति ही रहती है। केवल श्रीराम के भजन और भक्ति से ही मन को सच्चा विश्राम और आनंद प्राप्त होता है।

विस्तृत विवेचन :

इस दोहे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान राम की भक्ति की महिमा का सुंदर वर्णन किया है। वे कहते हैं कि—

जब तक जीव सांसारिक कार्यों, वासनाओं और विषयों में लिप्त रहता है, तब तक उसे कभी भी वास्तविक सुख नहीं मिलता।

संसार के सभी सुख अस्थायी हैं, और उनका अंत दुःख में ही होता है।

लेकिन जैसे ही मनुष्य भगवान श्रीराम का भजन करने लगता है, उसके जीवन से भय, दुःख और मोह मिट जाते हैं, और उसे परम शांति की प्राप्ति होती है।

अर्थात्, श्रीराम की भक्ति ही सच्चे सुख, शांति और मोक्ष का द्वार है।

निष्कर्ष :

मनुष्य को सांसारिक मोह-माया त्यागकर भगवान श्रीराम की शरण में जाना चाहिए, तभी जीवन में वास्तविक सुख और शांति संभव है।

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