सुन्दर काण्ड चौपाई (329-336)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 329-336 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे:

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।

बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।

संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।

जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।

भावार्थ

जो लोग प्रभु श्रीराम को छोड़कर अन्य देवताओं की भक्ति करते हैं, वे मनुष्य होकर भी बिना पूँछ और सींग के पशु के समान हैं।

भगवान श्रीराम ने विभीषण को अपना जन (भक्त) मानकर स्नेहपूर्वक अपनाया। प्रभु सर्वज्ञ हैं, सबके हृदय में निवास करते हैं, सब रूपों में व्याप्त होकर भी उनसे रहित और निष्पृह हैं।

श्रीराम नीति के पालन करने वाले हैं और दुष्ट राक्षसों के संहार के लिए ही मानव रूप में अवतरित हुए हैं।

वे कपिराज सुग्रीव और विभीषण से कहते हैं—“अब बताओ इस गहरे और भयानक समुद्र को किस उपाय से पार किया जाए?” यह समुद्र मगर, सर्प और बड़ी मछलियों से भरा हुआ, अत्यंत गहरा और दुस्तर है।

विभीषण विनम्र होकर कहते हैं—“प्रभु! आपका एक बाण करोड़ों समुद्रों को सुखा सकता है, परंतु नीति यह कहती है कि पहले सागर के पास विनयपूर्वक प्रार्थना करनी चाहिए।”

🪔 विस्तृत विवेचन

इस चौपाई में भगवान श्रीराम के करुणामय और नीति-परायण स्वभाव का सुंदर वर्णन है। विभीषण ने जब शरण ली, तो श्रीराम ने बिना किसी भेदभाव के उन्हें तुरंत स्वीकार कर लिया — यही भगवान का स्वभाव है। वे भक्त और अभक्त में भेद नहीं करते, केवल शरणागति को स्वीकार करते हैं।

फिर भगवान राम ने नीति के अनुसार युद्ध से पहले समुद्र को पार करने का उपाय पूछा। यह दर्शाता है कि यद्यपि भगवान सर्वशक्तिमान हैं, वे नीति और धर्म का पालन करते हुए कार्य करते हैं। विभीषण ने उन्हें नीति का मार्ग बताया—“भले ही आप चाहें तो बाण से समुद्र को सुखा सकते हैं, लेकिन उचित यह होगा कि पहले प्रार्थना कर अनुमति ली जाए।

👉 इससे यह शिक्षा मिलती है कि धर्म और नीति का पालन भगवान के लिए भी सर्वोपरि है। शक्ति होते हुए भी विनय और मर्यादा से कार्य करना ही आदर्श आचरण है।

🕉️ मुख्य संदेश:

सच्चा मार्ग प्रभु की भक्ति का है।

नीति और धर्म का पालन सबसे बड़ा बल है।

भगवान श्रीराम नीति-पालक और करुणामय हैं।

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