सुन्दर काण्ड चौपाई (361-368)
सुन्दर काण्ड चौपाई 361-368 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
इस चौपाई का प्रसंग है — जब रावण ने गुप्तचरों से राम की सेना और विभीषण के बारे में पूछा ।
चौपाई
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
भावार्थ:
हे रावण! जैसे आपने मुझसे कृपा कर पूछ लिया है, वैसे ही मेरा उत्तर भी बिना क्रोध किए समझना। जब तुम्हारा अनुज विभीषण श्रीराम से मिला, तभी श्रीराम ने उसे राज्य का तिलक कर दिया। अर्थात्, अब लंका पर राम का ही अधिकार है।
विवेचन:
गुप्तचर बड़ी नीति से रावण को समझाते हैं कि श्रीराम की कृपा असीम है। उन्होंने विभीषण को शरण में लेकर उसका राजतिलक कर दिया। इस प्रकार अब युद्ध करने का कोई औचित्य नहीं बचा, क्योंकि लंका का स्वामी विभीषण ही है। रावण को यह बात विनम्रता से बताकर गुप्तचर उसके अहंकार को शांत करना चाहते हैं।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
भावार्थ
रावण का दूत समझकर वानरों ने हमें बहुत कष्ट दिया और मेरे कान, नाक आदि काटने लगे, परंतु हमने श्रीराम की शपथ देने पर हमें छोड़ दिया।
विवेचन:
वे बताते हैं कि श्रीराम की सेना किसी को अन्याय से नहीं मारते। उन्होंने रावण के दूतों को भी बख्श दिया था। इससे वे रावण को यह समझा रहे हैं कि श्रीराम की सेना धर्मनिष्ठ और मर्यादित है।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
भावार्थ:
हे रावण! यदि आप चाहो तो श्रीराम की सेना के विषय में पूछो। उनके अनगिनत वानर और भालु हैं, जिनके रूप भयंकर और अत्यंत बलशाली हैं। उनकी संख्या और बल का वर्णन करोड़ों मुखों से भी नहीं किया जा सकता।
विवेचन:
गुप्तचर श्रीराम की सेना का परिचय देते हुए रावण को चेतावनी देते हैं। वे कहते हैं कि यह कोई साधारण सेना नहीं, बल्कि अपार शक्ति से संपन्न है। उसके आगे लंका की सेना टिक नहीं सकेगी।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
भावार्थ:
जिस वानर ने तेरे पुत्र अक्षय कुमार और लंका के नगर को जलाकर राख कर दिया, उसी हनुमानजी का बल तो समस्त वानरों में सबसे कम माना जाता है। और ऐसे अनगिनत पराक्रमी, भयंकर और बलशाली योद्धा श्रीराम की सेना में हैं।
विवेचन:
गुप्तचर यहाँ रावण के अहंकार को तोड़ते हुए कहते हैं कि जिसने लंका को जला दिया, वह हनुमान तो केवल एक दूत था और सबसे छोटा बलशाली था। जब दूत ही इतना पराक्रमी है, तो पूरी सेना का बल तो अकथनीय है। इससे रावण को चेतावनी दी जाती है कि अब भी श्रीराम के चरणों में शरण ले ले, अन्यथा विनाश निश्चित है।
सारांश:
इस पूरी चौपाई में गुप्तचरों ने अत्यंत नीति, विनम्रता और वीरता के साथ रावण को चेताया कि श्रीराम की कृपा असीम है, उनका बल अनंत है, और उनके दूत तक अपराजेय हैं। रावण चाहे तो अभी भी अहंकार त्यागकर राम की शरण में जाकर मुक्ति पा सकता है।
Comments
Post a Comment