सुन्दर काण्ड दोहा (4)

 सुन्दर काण्ड दोहा 4 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा

"तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।"

भावार्थ

हे तात (प्रियजन)! स्वर्ग, मोक्ष (अपवर्ग) और संसार के समस्त सुखों को यदि एक पलड़े में रखा जाए, और दूसरी ओर सत्संग (सज्जनों की संगति) के एक क्षण के सुख को रखा जाए, तो वह सत्संग का सुख उन सब पर भारी पड़ता है। अर्थात् सत्संग का एक क्षणिक सुख भी स्वर्ग, मोक्ष और संसार के समस्त भौतिक सुखों से श्रेष्ठ है।

विस्तृत विवेचन

1. शब्दार्थ

तात: प्रियजन, पुत्र, शिष्य या किसी प्रिय को संबोधित करने वाला शब्द।

स्वर्ग: वह स्थान जहाँ दिव्य सुख प्राप्त होते हैं।

अपबर्ग (अपवर्ग): मोक्ष, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।

सुख: आनंद, प्रसन्नता।

तुला: तराजू।

तूल: तुलना।

सकल: सभी।

लव: एक क्षण, बहुत कम समय।

सतसंग: संतों, सज्जनों या सत्पुरुषों की संगति।

2. संदर्भ

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के सुंदरकांड का है। इसमें हनुमान जी को लंकिनी ने सत्संग (संतों की संगति) के महत्व के बारे में बताया  है।

3. भावार्थ की व्याख्या

तुलसीदास जी कहते हैं कि संसार के सारे सुख, स्वर्ग का सुख और मोक्ष का सुख—ये सब मिलकर भी उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि सत्संग का एक क्षणिक सुख।

स्वर्ग का सुख भौतिक और क्षणिक है,

मोक्ष आत्मा की मुक्ति है,

सत्संग वह है जहाँ आत्मा को परमात्मा का साक्षात्कार, शांति, प्रेम, ज्ञान और भक्ति का अनुभव होता है।

सत्संग में व्यक्ति को सच्चे ज्ञान, भक्ति, सदाचार और जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध होता है। सत्संग से मनुष्य के भीतर छिपी अच्छाइयाँ जागृत होती हैं, और वह सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर परम शांति की ओर अग्रसर होता है।

4. संदेश और महत्त्व

सत्संग मनुष्य के जीवन को दिशा देता है।

सत्संग से व्यक्ति के विचार, आचरण और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

सत्संग के प्रभाव से मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति और सच्चा सुख मिलता है, जो किसी अन्य साधन से संभव नहीं।

तुलसीदास जी ने इस दोहे के माध्यम से सत्संग की महिमा बताते हुए यह स्पष्ट किया है कि भौतिक सुख क्षणिक हैं, लेकिन संतों की संगति से प्राप्त आध्यात्मिक सुख अमूल्य और शाश्वत है।

5. आधुनिक सन्दर्भ में प्रासंगिकता

आज के युग में भी, जब मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं की ओर आकर्षित है, सत्संग की महत्ता और भी बढ़ जाती है। सत्संग न केवल मानसिक शांति देता है, बल्कि जीवन के संकटों से उबरने की शक्ति भी प्रदान करता है।

निष्कर्ष

"सत्संग का एक क्षणिक सुख भी स्वर्ग, मोक्ष और समस्त भौतिक सुखों से श्रेष्ठ है।"

तुलसीदास जी का यह दोहा हमें यही सिखाता है कि जीवन में सच्चे सुख की प्राप्ति के लिए सदैव सत्संग की ओर उन्मुख रहना चाहिए। सत्संग से ही जीवन सार्थक और सफल बनता है।

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