सुन्दर काण्ड दोहा (5)
सुन्दर काण्ड दोहा 5 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0 - रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।"
यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित सुन्दरकाण्ड का एक अंश है, जिसमें हनुमानजी लंका में सीता माता के खोज में लंका में भ्रमण कर रहे हैं। वहां उन्हें एक ऐसा घर दिखाई दिया जहां श्रीराम के अस्त्र-शस्त्रों के चिह्नों से युक्त (राम नाम या राम के प्रतीकों से अंकित) था और तुलसी के नये पौधे लगे हुए थे।
शब्दार्थ:
रामायुध अंकित – श्रीराम के अस्त्र-शस्त्रों के चिह्नों से युक्त (राम नाम या राम के प्रतीकों से अंकित)
गृह सोभा – घर की शोभा
बरनि न जाइ – वर्णन नहीं की जा सकती
नव तुलसिका बृंद – नवीन तुलसी के पौधों का समूह
हरषि कपिराइ – वानरराज (हनुमान) हर्षित हो गए
भावार्थ:
हनुमानजी जब सीता माता की खोज में लंका भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने वहाँ के एक भवन को देखा, जिसकी शोभा अत्यंत अद्भुत थी। वह भवन श्रीराम के अस्त्र-शस्त्रों के चिह्नों से युक्त था, जिससे उसकी पवित्रता और दिव्यता झलक रही थी। वहाँ तुलसी के नए-नए पौधे लगे हुए थे, जिन्हें देखकर हनुमानजी अत्यंत प्रसन्न हो गए।
विस्तृत विवेचन:
इस दोहे में तुलसीदासजी ने लंका में स्थित उस भवन का वर्णन किया है जहां
रामायुध अंकित गृह: यह संकेत करता है कि उस स्थान पर श्रीराम के प्रतीकों या नामों की उपस्थिति थी।
गृह सोभा बरनि न जाइ: उस स्थान की शोभा इतनी दिव्य और अलौकिक थी कि उसका वर्णन करना कठिन है। यह संकेत करता है कि जहाँ श्रीराम का स्मरण और उनकी उपस्थिति होती है, वहाँ की शोभा स्वर्ग से भी बढ़कर होती है।
नव तुलसिका बृंद: तुलसी का पौधा हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और यह श्रीहरि विष्णु तथा श्रीराम को प्रिय है। राक्षसी लंका में तुलसी के पौधों का होना एक आश्चर्यजनक और शुभ संकेत है।
हरषि कपिराइ: हनुमानजी जब इस स्थान को देखते हैं, तो उन्हें यह विश्वास होने लगता है कि यहां जो व्यक्ति निवास करता है वह राम का कोई प्रिय भक्त हैं।
संदेश:
यह दोहा यह भी दर्शाता है कि जहाँ भक्ति, पवित्रता और श्रीराम का स्मरण होता है, वहाँ दिव्यता स्वयं आ जाती है, चाहे वह स्थान राक्षसों की नगरी ही क्यों न हो। हनुमानजी की भक्ति और विवेक उन्हें सही स्थान तक ले जाते हैं।
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