सुन्दर काण्ड (27-28)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 27-28 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

तहाँ जाइ देखी बन सोभा।

गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।

नाना तरु फल फूल सुहाए।

खग मृग बृंद देखि मन भाए।।

आइए, इसका भावार्थ एवं विस्तृत विवेचन करते हैं—

शब्दार्थ

तहाँ – वहाँ (समुद्र के किनारे)

जाइ – जाकर

देखी – देखी

बन सोभा – वन की शोभा (सौंदर्य)

गुंजत – गूंज रही थी

चंचरीक – भौंरे

मधु लोभा – मधु (शहद/रस) के लोभ में

नाना तरु – अनेक प्रकार के वृक्ष

फल फूल सुहाए – सुंदर फल-फूल

खग – पक्षी

मृग बृंद – पशु समूह

मन भाए – मन को भाने वाले

भावार्थ

हनुमानजी जब सिंहिका को मार कर आगे बढ़े तो समुद्र पार करने के बाद उन्होंने वहाँ के वन की अनुपम शोभा देखी। वहाँ भौंरे मधुर रस के लोभ में गूंज रहे थे। अनेक प्रकार के सुंदर वृक्ष, उन पर खिले हुए रंग-बिरंगे फूल और स्वादिष्ट फल, तथा पक्षियों और पशुओं के समूह वहाँ की शोभा को और भी बढ़ा रहे थे। यह दृश्य हनुमानजी के मन को बहुत भाया।

विस्तृत विवेचन

1. प्रसंग

यह चौपाई सुंदरकाण्ड में तब आती है, जब समुद्र पार करने के बाद वे लंका की ओर आगे बढ़े तो वहां के वनों की शोभा देखकर वे मुग्ध हो जाते हैं।

2. प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन

हनुमानजी वन की सुंदरता का अवलोकन करते हैं। वहाँ के वृक्षों पर खिले फूल, लदे फल, और उन पर मंडराते भौंरे प्राकृतिक सौंदर्य की चरम सीमा का परिचय देते हैं। भौंरे फूलों के रस के लोभ में गूंज रहे हैं, जिससे वातावरण में मधुर गुंजार हो रही है। यह सब देखकर हनुमानजी का मन प्रसन्न हो जाता है।

3. जीव-जंतुओं की छवि

वन में पक्षियों का कलरव, मृगों (हिरण आदि) के झुंड, और उनकी चंचलता वन की शोभा को और बढ़ा देती है। यह सब दर्शाता है कि लंका में प्रवेश करने से पहले वहां के वनों की शोभा रावण की शक्ति का ही नहीं, बल्कि प्रकृति की सुंदरता और समृद्धि का भी प्रतीक थी।

4. हनुमानजी की भावनाएँ

हनुमानजी वन की सुंदरता देखकर कुछ क्षण के लिए अपनी चिंता भूल जाते हैं। परंतु वे अपने उद्देश्य को नहीं भूलते—सीता माता की खोज। प्रकृति की सुंदरता भी उनके मन को विचलित नहीं कर पाती, वे अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहते हैं।

5. काव्य सौंदर्य

इस चौपाई में तुलसीदासजी ने अत्यंत सुंदर प्रकृति चित्रण किया है। शब्दों की मधुरता, दृश्य की सजीवता और वातावरण की रमणीयता पाठक को भी उस सौंदर्य का अनुभव कराती है।

निष्कर्ष

इस चौपाई के माध्यम से तुलसीदासजी ने न केवल लंका में प्रवेश करने से पहले वहां के वनों के सौंदर्य का वर्णन किया है, बल्कि यह भी दर्शाया है कि प्रकृति की सुंदरता और समृद्धि भी मनुष्य के मन को मोह सकती है, किंतु सच्चा साधक अपने लक्ष्य से नहीं भटकता। हनुमानजी का कर्तव्यनिष्ठ भाव, उनकी एकाग्रता और दृढ़ संकल्प, इस प्रसंग में भी स्पष्ट झलकता है

संक्षेप में:

हनुमानजी ने वन की अनुपम सुंदरता का अवलोकन किया, जहाँ भौंरे गूंज रहे थे, रंग-बिरंगे फूल-फल लदे वृक्ष थे, और पक्षी-पशु समूह मन को लुभा रहे थे। फिर भी, वे अपने उद्देश्य—सीता माता की खोज—से विचलित नहीं हुए।

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