सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 33-40 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।

नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।

मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।

तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

भावार्थ (सारांश)

हनुमानजी ने मच्छर के समान छोटा रूप धारण किया और भगवान नरहरि (श्रीराम) का स्मरण करते हुए लंका की ओर चले। लंका के द्वार पर लंकिनी नामक एक राक्षसी रहती थी, जिसने हनुमानजी को रोककर अपमानित किया और कहा—"हे मूर्ख! तू मेरा रहस्य नहीं जानता। जहाँ तक कोई चोर आता है, वह मेरा आहार बनता है।"

हनुमानजी ने उसे एक घूंसा मारा, जिससे वह भूमि पर गिरकर खून उगलने लगी। फिर वह संभलकर उठी और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोली—"जब ब्रह्मा ने रावण को वरदान दिया था, तब ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि जब कोई वानर आकर तुझे मारेगा, तभी समझना कि राक्षसों का विनाश निकट है। हे तात! मेरा बहुत पुण्य है कि मैंने अपने नेत्रों से श्रीराम के दूत को देखा।"

विस्तृत विवेचन

1. हनुमानजी का लंका प्रवेश

हनुमानजी माता सीता की खोज में समुद्र पार कर लंका पहुँचते हैं। लंका के द्वार पर 'लंकिनी' नामक राक्षसी का पहरा है, जो लंका की रक्षक मानी जाती है। हनुमानजी ने लंका में प्रवेश करने के लिए अपने शरीर को मच्छर के समान छोटा कर लिया, जिससे वह किसी की नजर में न आएँ। यहाँ 'मसक समान रूप' हनुमानजी की माया, शक्ति और विवेक का परिचायक है।

2. लंकिनी का परिचय और अहंकार

लंकिनी ने हनुमानजी को रोककर कहा कि वह लंका की रक्षक है और कोई भी चोर या घुसपैठिया उसका आहार बनता है। यह लंकिनी का अहंकार और अपने कर्तव्य के प्रति सजगता को दर्शाता है। वह हनुमानजी को तुच्छ समझती है और उनका उपहास करती है

3. हनुमानजी की शक्ति और लंकिनी का पराभव

हनुमानजी ने एक ही घूंसे में लंकिनी को परास्त कर दिया, जिससे उसके मुँह से खून निकल आया और वह भूमि पर गिर पड़ी। यह हनुमानजी की अद्भुत शक्ति, साहस और उनके उद्देश्य की दृढ़ता को दर्शाता है। लंकिनी का पराजित होना राक्षसी सत्ता के पतन का संकेत है।

4. लंकिनी की विनम्रता और भविष्यवाणी

संभलकर उठने के बाद लंकिनी ने हनुमानजी के चरणों में सिर झुका दिया और विनयपूर्वक कहा कि जब ब्रह्मा ने रावण को वरदान दिया था, तब उन्होंने कहा था कि जब कोई वानर आकर तुझे परास्त करेगा, तभी समझना कि राक्षसों का विनाश निकट है। लंकिनी को यह भी गर्व है कि उसने अपने नेत्रों से श्रीराम के दूत को देखा है, जो उसके पुण्य का फल है।

5. प्रतीकात्मक अर्थ

लंकिनी का पराभव केवल एक राक्षसी का पराजय नहीं, बल्कि अधर्म, अहंकार और अन्याय के अंत का प्रतीक है। हनुमानजी का लंका में प्रवेश धर्म की विजय और श्रीराम के कार्य की सिद्धि का प्रथम संकेत है। लंकिनी का ब्रह्मा से मिला वरदान यह भी दर्शाता है कि जब पाप अपने चरम पर पहुँचता है, तब उसका अंत निश्चित होता है।

निष्कर्ष

इस प्रसंग में हनुमानजी की बुद्धि, शक्ति, श्रीराम के प्रति भक्ति और लंका विजय की शुरुआत का सुंदर चित्रण मिलता है। लंकिनी के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि जब अधर्म बढ़ जाता है, तब ईश्वर के दूत (या स्वयं ईश्वर) उसका विनाश करने अवश्य आते हैं।

यह प्रसंग हमें साहस, विवेक, कर्तव्यनिष्ठा और भक्ति का आदर्श भी प्रस्तुत करता है।

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