सुन्दर काण्ड चौपाई ( 49-56)
सुन्दर काण्ड चौपाई 49-56 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
लंका निसिचर निकर निवासा।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा।
तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
शब्दार्थ व भावार्थ:
– लंका = रावण की राजधानी,
– निसिचर निकर निवासा = राक्षसों का समूह जहाँ वास करता है,
– सज्जन कर बासा = सज्जनों (भले व्यक्तियों) का निवास,
– तरक = विचार करना
हनुमानजी सोचने लगते हैं कि ये लंका तो राक्षसों का घर है, यहाँ भले लोगों का क्या काम? यानी क्या किसी सज्जन का यहाँ पर वास संभव है? उनके मन में विचार आता है कि हो सकता है यहाँ कोई भला व्यक्ति हो। उसी समय विभीषण जागते हैं।
भावार्थ:
लंका राक्षसों की नगरी है, ऐसे स्थान पर सज्जन व्यक्ति का वास संदेहास्पद लगता है। हनुमानजी सोचते हैं कि क्या शकुन्तलों के बीच में कोई साधू भी हो सकता है? तभी विभीषण प्रकट होते हैं, जो स्वयं एक सत्पुरुष हैं।
अगली पंक्तियाँ:
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।
साधु ते होइ न कारज हानी।।
विभीषण ‘‘राम-राम’’ नाम स्मरण करते हैं, जिससे हनुमानजी अत्यंत प्रसन्न होते हैं और यह पहचान लेते हैं कि ये सज्जन पुरुष हैं। हनुमानजी निश्चय करते हैं कि इससे मिलकर रहूँगा, क्योंकि सज्जनों से कोई हानि नहीं होती, अपितु कल्याण ही होता है।
तत्पश्चात:
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए।
सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
हनुमानजी ब्राह्मण का रूप धारण कर के कुछ वचन बोलते हैं। इसे सुनकर विभीषण उनके पास आ जाते हैं, प्रणाम करके कुशल पूछते हैं और निवेदन करते हैं कि हे विप्रदेव! कृपया अपनी कथा बताइए।
अंतिम पंक्तियाँ:
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
आयहु मोहि करन बड़भागी।।
विभीषण पूछते हैं कि क्या आप भगवान के दासों में से कोई हैं? क्योंकि मेरा हृदय आपसे अपार प्रेम कर रहा है। क्या आप श्रीराम के भक्त हैं जो मुझे दर्शन देने आए हैं? यह मेरा महान सौभाग्य होगा।
विस्तृत विवेचन:
इस प्रसंग में गोस्वामी तुलसीदास जी भक्ति और विवेक का उच्च स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। लंका जैसे दुर्जन प्रदेश में भी विभीषण जैसे सज्जन मौजूद हैं, जिससे यह संदेश मिलता है कि सज्जन हर स्थान पर हो सकते हैं, चाहे वे दुर्गम या पापयुक्त स्थान ही क्यों न हों।
हनुमानजी की सज्जनता और विवेक उनसे विभीषण को पहचानने में सहायक होती है। विभीषण की राम-नाम स्मरण साधुता की पहचान है। हनुमानजी इस संकेत को समझ जाते हैं और इस भेंट के माध्यम से इस कथानक में दो महान भक्तों — हनुमान और विभीषण — का अद्भुत सम्वाद होता है।
नैतिक शिक्षा:
सज्जन का कोई स्थान नहीं बँधा होता।
सच्चे भक्त की पहचान उसके व्यवहार और स्मरण से होती है।
भक्तों का आपसी मिलन प्रारब्ध और सौभाग्य से होता है।
जहाँ राम-नाम है, वहीं सद्गुण और सत्य का वास होता है।
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