सुन्दर काण्ड चौपाई (99-112)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 99-112 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

"त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।

आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।

सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।

सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।

निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।

पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।

सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।

नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।

देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।"

भावार्थ (सरल अर्थ):

सीता माता बहुत दुखी होकर त्रिजटा से हाथ जोड़कर कहती हैं — "हे माता! तू मेरी दुख की संगिनी है, अब मेरी सहायता कर। मैं यह विरह और अपमान सहन नहीं कर सकती, मुझे अग्नि दिलाकर चिता बना दो ताकि मैं प्राण त्याग सकूं।"

वह अशोक वृक्ष से भी विनती करती हैं — "तू असोक (जिसे दुःख न हो) कहलाता है, तो अब अपने नाम को सार्थक कर, मेरी पीड़ा हर ले और अपनी नई पत्तियों से अग्नि प्रदान कर।"

सीता अत्यंत दुःख में हैं, चारों ओर उन्हें अग्नि के चिन्ह दिखते हैं — जैसे आकाश में तारे नहीं दिखते, केवल अंगारे दिखते हैं, चंद्रमा भी जलता हुआ प्रतीत होता है। वे समझती हैं कि विधाता उनके प्रति प्रतिकूल हो गया है।

त्रिजटा उन्हें प्रभु श्रीराम की महिमा, बल और विजय की गाथा सुना कर समझाती है और आश्वासन देकर अपने घर लौट जाती है।

विस्तृत विवेचन:

1. सीता की पीड़ा और त्याग की भावना:

यह चौपाई माता सीता के चरम दुख और मानसिक अवस्था को दर्शाती है। जब उन्हें कोई आशा नहीं दिखती, तो वे मृत्यु को ही अंतिम उपाय मानती हैं। यह उनकी पतिव्रता धर्म की पराकाष्ठा है।

2. विरह और अग्नि की याचना:

त्रिजटा से चिता बनाने और अग्नि लाने को कहती हैं। यह आत्मसमर्पण की भावना नहीं, बल्कि प्रेम और स्वाभिमान से जन्मी आहुति की इच्छा है।

3. प्रकृति से संवाद:

सीता अशोक वृक्ष से कहती हैं कि तू 'अशोक' कहलाता है, पर मैं तो दुख में डूबी हूं। यह प्रकृति के साथ एक भावनात्मक संवाद है, जो उनकी करुण स्थिति को और गहरा बनाता है।

4. त्रिजटा की भूमिका:

त्रिजटा केवल एक राक्षसी नहीं, बल्कि एक सहानुभूतिपूर्ण पात्र है। वह सीता को सांत्वना देती है, प्रभु श्रीराम की शक्ति और प्रताप की बात करके उन्हें धैर्य देती है।

5. दृश्य का प्रभाव:

सीता को चारों ओर अग्नि, जलता आकाश और तारे दिखाई नहीं देते, यह उनके मानसिक ताप और विरहाग्नि को दर्शाता है। यह एक अलंकारिक चित्र है, जो सीता की दशा को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है।

6. हनुमान की प्रतीक्षा:

आख़िरी पंक्ति — "देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।" — से पता चलता है कि यह दृश्य उस क्षण का है जब हनुमान माता सीता को देखने पहुँचे, और उन्हें इस दुःख में देखकर अत्यंत व्याकुल हो गए।

निष्कर्ष:

यह चौपाई सीता माता की मानसिक वेदना, उनका आत्मबल, पतिव्रता धर्म, प्रकृति से करुण प्रार्थना और त्रिजटा जैसे सहायक पात्रों के माध्यम से एक भावनात्मक चित्र प्रस्तुत करती है। सुंदरकांड में यह प्रसंग पाठक के हृदय को गहराई से छू जाता है और श्रीराम से मिलने की आशा को भी जाग्रत करता है।

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