सुन्दर काण्ड चौपाई (17-21)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 17-21 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।

तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।

तासु दून कपि रूप देखावा।।

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।

अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।

मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।

बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।

भावार्थ

हनुमानजी जब समुद्र पार कर रहे थे, तब मार्ग में सुरसा नामक सर्पों की माता, जिसे देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने के लिए भेजा था। सुरसा ने हनुमानजी से कहा कि वह उन्हें खा जाएगी। हनुमानजी ने विनम्रता से कहा कि वे रामजी का कार्य करके लौटते समय उसके मुख में प्रवेश कर लेंगे, पर सुरसा नहीं मानी और उसने अपना मुख सोलह योजन (लगभग 128 मील) चौड़ा कर लिया। हनुमानजी ने तुरंत अपना शरीर बत्तीस योजन (256 मील) बड़ा कर लिया। सुरसा ने जितना अपना मुख बढ़ाया, हनुमानजी ने उससे दुगना अपना शरीर बढ़ा लिया। अंत में हनुमानजी ने बहुत छोटा रूप धारण किया और झट से उसके मुख में प्रवेश कर बाहर निकल आए। इस प्रकार उन्होंने उसकी शर्त पूरी कर दी। सुरसा ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि उन्हें देवताओं ने उनकी बुद्धि, बल और रहस्य को परखने के लिए भेजा था, जिसमें वे सफल हुए।

विस्तृत विवेचन

1. हनुमानजी की बुद्धि और विवेक

इस प्रसंग में हनुमानजी की अद्भुत बुद्धि, विवेक और चातुर्य का परिचय मिलता है। सुरसा ने जब अपना मुख फैलाया, तो हनुमानजी ने भी अपना शरीर बढ़ा लिया। परंतु जब समस्या का समाधान नहीं निकला, तो उन्होंने अपनी चतुराई से छोटा रूप धारण कर उसके मुख में प्रवेश कर बाहर निकल आए। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल बल से नहीं, बल्कि बुद्धि और चतुराई से भी बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है।

2. रामकाज के प्रति समर्पण

हनुमानजी हर परिस्थिति में रामकाज (रामजी का कार्य) को सर्वोपरि मानते हैं। वे सुरसा से विनम्रता पूर्वक कहते हैं कि वे रामजी का कार्य करके लौटते समय उसके मुख में प्रवेश करेंगे। यह उनकी कार्यनिष्ठा और समर्पण को दर्शाता है।

3. सुरसा का उद्देश्य

सुरसा कोई सर्पों की माता थी और देवताओं द्वारा भेजी गई थी। उसका उद्देश्य हनुमानजी की परीक्षा लेना था। जब हनुमानजी ने अपनी बुद्धि, बल और विवेक का परिचय दिया, तो सुरसा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि उन्होंने उनकी असली पहचान और उद्देश्य को समझ लिया है।

4. संदेश

इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में जब भी कोई बड़ी समस्या या चुनौती आए, तो केवल शक्ति या बल का प्रयोग न करें, बल्कि बुद्धि, विवेक और धैर्य से काम लें। विनम्रता और चतुराई से हर समस्या का समाधान संभव है।


निष्कर्ष

सुंदरकाण्ड की यह चौपाई हनुमानजी के अद्वितीय गुणों—बुद्धि, बल, विवेक, विनम्रता और रामकार्य के प्रति समर्पण—का सुंदर उदाहरण है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य, बुद्धि और विवेक से काम लें, तो सफलता अवश्य मिलेगी।

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