सुन्दर काण्ड दोहा (10)

दोहा:

"भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।

सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।" (सुंदर कांड, दोहा 10)

भावार्थ (सरल अर्थ):

जब रावण (दसकंधर) अपने भवन चला गया, तब उसने कई भयानक रूपवाली राक्षसियों (पिशाचिनियों) को आज्ञा दी कि वे सीता को डराएँ। वे राक्षसियाँ अनेक भयंकर और डरावने रूप धारण करके सीता को तरह-तरह से त्रास (कष्ट) देने लगीं।

विस्तृत विवेचन:

यह दोहा उस समय का वर्णन करता है जब रावण सीता माता को अशोक वाटिका में चेतावनी देकर और राक्षसियों को नियुक्त कर चला गया। रावण जानता था कि सीता को केवल बल प्रयोग से नहीं जीता जा सकता, इसलिए उसने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने के लिए डरावनी राक्षसियों को नियुक्त किया।

"भवन गयउ दसकंधर" — रावण, जो दस सिरों वाला था, सीता से वार्तालाप के बाद अपने महल लौट गया।

"इहाँ पिसाचिनि बृंद" — उसके आदेश से कई पिशाचिनियाँ (भयानक राक्षस स्त्रियाँ) वहाँ आईं।

"सीतहि त्रास देखावहि" — इनका उद्देश्य था सीता को मानसिक रूप से डराकर उनका मनोबल तोड़ना।

"धरहिं रूप बहु मंद" — वे अनेक भयंकर, कुरूप और डरावने रूप धारण कर सीता को त्रास देने लगीं।

यह प्रसंग हमें माता सीता के धैर्य, संयम और अटूट धर्म-निष्ठा को दर्शाता है। भले ही वह कठिन परिस्थिति में थीं, लेकिन उन्होंने न तो डर का सामना करके अपना धर्म छोड़ा, न ही रावण के आगे झुकीं। यह दोहा यह भी दिखाता है कि अत्याचार और अन्याय के समय सच्चा साहस क्या होता है।

सार:

यह दोहा रावण की नीचता और सीता माता की दृढ़ता दोनों को उजागर करता है। इसमें भय और धर्म के बीच संघर्ष दिखाया गया है ,जिसमें धर्म की जीत सुनिश्चित है।

Comments

Popular posts from this blog

सुन्दर काण्ड (चौपाई 15-16)

सुन्दर काण्ड चौपाई ( 33-40)

सुन्दर काण्ड चौपाई (195-204)