सुन्दर काण्ड चौपाई (65-72)

 यह चौपाई और उसके आस-पास की पंक्तियाँ रामचरितमानस के सुन्दर काण्ड से ली गई हैं। यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमान जी लंका पहुँच चुके हैं और माता सीता की खोज कर रहे हैं। उन्होंने विभीषण से मिलकर सीता माता का स्थान जाना और अब वे उन्हें देखने हेतु अशोक वाटिका में जा रहे हैं।

चौपाई 65

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।

भावार्थ:

विभीषण जी सोचते हैं—प्रभु उन्हें भूल गए है।

अब एक-एक चरण का विस्तृत विवेचन करते हैं:

‘जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।’

विभीषण सोचते हैं  कि श्रीराम उनके परम प्रिय स्वामी हैं, वे उन्हें अवश्य ढूंढ लेंगे, उनकी रक्षा करेंगे। फिर ऐसा कौन-सा कारण है कि उस विश्वास के होते हुए भी वे इतना दुःख क्यों सह रहे हैं? इसका कारण यह बताया गया है कि—

‘फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।’

अर्थात् वे दुःखी हो रही हैं क्योंकि यह स्वाभाविक है। शरीरधारी जीव, चाहे जितना ज्ञानी या भक्त क्यों न हो, जब दुखद परिस्थिति आती है तो मन विचलित हो सकता है। यह भाव यह दर्शाता है कि विभीषण जी दिन-रात राम का स्मरण करते हैं, फिर भी कष्ट में हैं, क्योंकि यह संसार का स्वाभाविक नियम है।

चौपाई 66

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।’

हनुमान जी इस प्रकार श्रीराम के गुणों का चिंतन करते हुए अपने ह्रदय में अद्भुत और अवर्णनीय (जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता) सुख का अनुभव करते हैं। यह शुद्ध भक्ति भाव की स्थिति है—जहाँ संकट के क्षण में भी भगवान के नाम और गुणों का स्मरण मस्तिष्क को शांति देता है।

चौपाई 67

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।

अब विभीषण ने हनुमान जी को यह बताया कि सीता माता अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठी हैं। उनका स्थान और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है, वह सब विस्तार से बताई।

चौपाई 68

‘तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।

हनुमान जी कहते हैं—"हे भ्राता, मैं जानकी माता को देखना चाहता हूँ, कृपया कोई उपाय बताइए जिससे मैं बिना किसी विघ्न के माता सीता तक पहुँच सकूँ।"

चौपाई 69

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।

विभीषण ने एक-एक बात और उपाय समझाया कि कैसे हनुमान माता सीता तक पहुँच सकते हैं। फिर उन्होंने हनुमान जी को आदरपूर्वक विदा किया।

चौपाई 70

करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।

हनुमान जी अब छोटा-सा वानर रूप बना लेते हैं (सूक्ष्म रूप), ताकि कोई उन्हें देख न सके और वे सीधे अशोक वाटिका में उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ माता सीता निवास कर रही हैं, एक वृक्ष के नीचे।

चौपाई 71

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।

हनुमान जी ने दूर से ही माता सीता को देखकर मन ही मन प्रणाम किया और एक वृक्ष की ओट में छिपकर बैठ गए और देख रहे हैं। रात का अंतिम प्रहर धीरे-धीरे बीत रहा है।

चौपाई 72

कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

यहाँ सीता जी की दुःखभरी दशा का करुण चित्रण है:

कृश तन (दुबला-पतला शरीर),

सिर पर एक बेनी (एक जटा की चोटी),

मन में बार-बार श्रीराम के गुणों का स्मरण, मंत्र जाप अथवा ध्यान।

उनकी यह स्थिति देखकर हनुमान जी का हृदय भीग जाता है।

सारांश:

इस चौपाई और उसके आस-पास की चौपाइयों में भक्ति, करुणा और मर्यादा का सुंदर समन्वय है। यह दृश्य बताता है कि:

भले ही व्यक्ति भक्त हो, प्रभु को जानता हो, लेकिन कठिन परिस्थितियों में उसे दुःख होता है।

हनुमान जी जैसे सेवक अपने इष्ट को पाने के लिए संयम से कार्य करते हैं।

सीता जी की दशा से स्पष्ट होता है कि वे पूरी निष्ठा और भक्ति से श्रीराम का ध्यान कर रही हैं, भले ही वे विपत्ति में हैं।

यह प्रसंग न केवल मार्मिक है, बल्कि हनुमान जी की सेवा भावना और सीता जी की अडिग भक्ति दोनों का अद्भुत उदाहरण है।

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