सुन्दर काण्ड दोहा (12)
सुन्दर काण्ड दोहा 12 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा:
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
शब्दार्थ:
कपि – हनुमान जी
हृदयँ बिचार – हृदय में विचार करके
मुद्रिका – अंगूठी
असोक अंगार – अशोक वाटिका में अग्नि (यहाँ संकेतात्मक रूप से उपयोग)
हरषि – प्रसन्न होकर
गहेउ – पकड़ लिया, ग्रहण किया
भावार्थ:
हनुमान जी ने यह सोचकर कि माता सीता को अपनी बात पर विश्वास दिलाना आवश्यक है, श्रीराम की दी हुई मुद्रिका (अंगूठी) पेड़ पर से नीचे गिरा दिया। सीता जी ने जैसे ही वह मुद्रिका देखी, मानो उन्हें अशोक वाटिका में जलता हुआ अंगारा (आशा और विश्वास की लौ) मिल गया। वे अत्यंत हर्षित होकर उठीं और उस मुद्रिका को हाथ में लेकर पकड़ लिया।
विस्तृत विवेचन
इस दोहे में रामदूत हनुमान द्वारा सीता को श्रीराम की मुद्रिका सौंपने की घटना का अत्यंत मार्मिक और प्रतीकात्मक वर्णन किया गया है। जब हनुमान जी ने श्रीराम की मुद्रिका को पेड़ पर से नीचे गिरा दिया , तो यह केवल एक अंगूठी नहीं थी, बल्कि विश्वास, प्रेम और आश्वासन का प्रतीक थी।
हनुमान ने पहले विचार किया फिर श्रीराम की मुद्रिका को पेड़ पर से नीचे गिरा दिया जिसे आग का गोला समझकर सीता ने उठा लिया । इसने उनकी आशा को पुनर्जीवित कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे किसी निराश व्यक्ति को अंधेरे में रोशनी की एक किरण मिलती है।
"अशोक अंगार" की उपमा इस बात को दर्शाती है कि जो अशोक वाटिका अब तक उनके लिए दुख का स्थान थी, वहीं अब हर्ष और आशा का केंद्र बन गई।
सार:
यह दोहा श्रीराम और सीता के बीच प्रेम के अमिट बंधन, हनुमान की बुद्धिमत्ता और भक्ति, तथा विश्वास के माध्यम से आशा के पुनर्जागरण का सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है।
Comments
Post a Comment