सुन्दर काण्ड दोहा (8)

 सुन्दर काण्ड दोहा 8 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा:

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।

शब्दार्थ:

निज पद नयन दिएँ – अपने चरणों को जानकी जी ने आँखों से देखा

मन राम पद कमल लीन – मन श्रीराम के चरण कमलों में लीन रहा

परम दुखी भा पवनसुत – पवनपुत्र हनुमान अत्यंत दुखी हो गए

देखि जानकी दीन – जानकी (सीता माता) की दीन दशा देखकर

भावार्थ:

सीता माता की दशा बहुत ही दुःखद हो गई थी। उन्होंने अपने पैरों की ओर देखा लेकिन मन तो प्रभु श्रीराम के चरणों में ही लीन था। जब हनुमान जी ने माता सीता की ऐसी दीन-हीन, दुःखभरी स्थिति देखी, तो वे अत्यंत दुःखी हो गए।

विस्तृत विवेचन:

यह दोहा उस प्रसंग को दर्शाता है जब हनुमान जी अशोक वाटिका में माता सीता को पहली बार देखते हैं। वे देख रहे हैं कि माता अत्यंत पीड़ित, चिंतित और अत्याचार सहन कर रही हैं। सीता जी का मन हर समय श्रीराम के ध्यान में मग्न है, और वे अपने शरीर की ओर भी ध्यान नहीं देतीं।

इस स्थिति में, जब वे अपने पैर की ओर देखती हैं, तो यह दर्शाता है कि वे संसार से जैसे पूरी तरह विरक्त हो चुकी हैं, लेकिन हृदय से प्रभु श्रीराम के चरणों में लीन हैं। उनका तन कष्ट झेल रहा है लेकिन मन राम में रमा हुआ है। यह भक्त के समर्पण और प्रेम की चरम अवस्था है।

हनुमान जी को जब सीता जी की यह हालत दिखती है — अश्रुपूरित नेत्र, क्षीण शरीर, विरह वेदना से व्याकुल — तो वे अत्यंत द्रवित हो जाते हैं। उनका हृदय करुणा से भर उठता है। यह दर्शाता है कि हनुमान जी केवल वीर नहीं, अत्यंत संवेदनशील और करुणामयी भक्त भी हैं।

संदेश:

सच्चा भक्त कष्ट में भी प्रभु को नहीं भूलता।

हनुमान जी का करुणा-भाव उनके भक्त हृदय का प्रतीक है।

यह दोहा भक्त और भगवान के अटूट प्रेम को दर्शाता है, जहाँ शरीर की पीड़ा से परे मन केवल प्रभु में लीन रहता है।

यह दोहा भक्तिभाव, करुणा और विरह की गहराई का सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है।

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