सुन्दर काण्ड छंद (1-3)

 सुन्दर काण्ड छंद 1-3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

छंद

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।

भावार्थ (सरल अर्थ)

हनुमानजी जब लंका पहुँचते हैं, तो वे वहाँ की भव्यता और रावण की सेना का वर्णन करते हैं:

लंका का वैभव:

सोने की बनी हुई लंका की दीवारें, उसमें जड़े हुए अनगिनत रत्न, सुंदर और घने महल, चौक-चौराहे, बाजार, सुंदर सड़कें – हर प्रकार से लंका नगरी अत्यंत सुंदर और समृद्ध है।

सेना और राक्षसों का वर्णन:

लंका में हाथियों, घोड़ों, खच्चरों, पैदल सैनिकों और रथों की अपार संख्या है, जिनकी गिनती करना भी कठिन है। वहाँ के राक्षस अनेक रूपों वाले, अत्यंत बलशाली और विशाल सेना के रूप में हैं, जिनका वर्णन करना भी संभव नहीं।

प्राकृतिक सौंदर्य और विविधता:

लंका में वन, बाग-बगिचे, सरोवर, कुएँ, बावड़ियाँ आदि शोभायमान हैं। वहाँ मनुष्य, नाग, देवता, गंधर्व कन्याओं के रूप वाले राक्षस हैं, जिनका सौंदर्य मुनियों के मन को भी मोहित कर सकता है। कहीं-कहीं विशालकाय, पर्वत जैसे बलशाली राक्षस गर्जना कर रहे हैं। कई अखाड़ों में वे आपस में युद्धाभ्यास करते हैं और एक-दूसरे को ललकारते हैं।

रक्षा व्यवस्था और राक्षसी प्रवृत्ति:

नगर के चारों ओर भयंकर योद्धा कड़ी सुरक्षा में तैनात हैं। कहीं-कहीं राक्षस भैंस, मनुष्य, गाय, गधा, बकरी आदि का भक्षण करते हैं।

तुलसीदास जी कहते हैं – इन्हीं राक्षसों की कथा मैंने संक्षेप में कही है, क्योंकि अंत में ये सब श्रीराम के बाणों से मारे जाकर अपने शरीर त्यागकर परम गति को प्राप्त होंगे।

विस्तृत विवेचन

1. लंका का ऐश्वर्य और स्थापत्य

हनुमानजी जब लंका में प्रवेश करते हैं, तो वे उसकी भव्यता देखकर चकित रह जाते हैं। लंका की दीवारें सोने की बनी हैं, जिनमें अनगिनत रत्न जड़े हैं। यह नगरी चारों ओर से सुंदर महलों, चौक-चौराहों, बाजारों और सड़कों से सुसज्जित है। यह चित्रण बताता है कि रावण की लंका केवल शक्ति का ही नहीं, बल्कि धन, वैभव और स्थापत्य कला का भी केंद्र थी।

2. सेना और राक्षसों की विविधता

लंका में असंख्य प्रकार के सैनिक हैं – हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल सैनिक, रथ आदि। रावण की सेना इतनी विशाल और विविध है कि उसकी गिनती करना भी असंभव है। यहाँ के राक्षस अनेक रूपों वाले, अत्यंत बलशाली और विकराल हैं। यह वर्णन लंका की सैन्य शक्ति और युद्ध के लिए उसकी तैयारी को दर्शाता है।

3. प्राकृतिक सौंदर्य एवं राक्षसों का विचित्र रूप

लंका केवल एक युद्धभूमि नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य से भी परिपूर्ण है – बाग-बगिचे, सरोवर, कुएँ, बावड़ियाँ आदि। यहाँ के राक्षस केवल भयानक नहीं, बल्कि वे देवता, गंधर्व, नाग आदि के रूप में भी हैं, जिनका सौंदर्य मुनियों को भी मोहित कर सकता है। कहीं-कहीं पर्वत जैसे विशालकाय राक्षस गर्जना कर रहे हैं, तो कहीं अखाड़ों में युद्धाभ्यास कर रहे हैं।

4. रक्षा व्यवस्था और राक्षसी प्रवृत्तियाँ

लंका की सुरक्षा अत्यंत सुदृढ़ है। चारों ओर भयंकर योद्धा तैनात हैं। राक्षसों की प्रवृत्ति अत्यंत क्रूर है – वे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि का भक्षण करते हैं। यह उनकी अमानवीयता और राक्षसी प्रवृत्ति को दर्शाता है।

5. तुलसीदास जी की टिप्पणी

अंत में तुलसीदास जी कहते हैं कि इन राक्षसों की कथा मैंने संक्षेप में कही है, क्योंकि अंततः ये सभी श्रीराम के बाणों से मारे जाएंगे और अपने शरीर त्यागकर परम गति को प्राप्त करेंगे। यहाँ यह संकेत है कि चाहे रावण की लंका कितनी भी समृद्ध, शक्तिशाली और सुंदर हो, अधर्म का अंत निश्चित है।

निष्कर्ष

इस छंद में तुलसीदास जी ने लंका नगरी के ऐश्वर्य, रावण की सेना की शक्ति, वहाँ के राक्षसों की विविधता और उनकी क्रूरता का अत्यंत सुंदर और सजीव चित्रण किया है। साथ ही, वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि अधर्म और अन्याय का अंत निश्चित है।

यह छंद न केवल लंका के वैभव का वर्णन करता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि शक्ति, संपत्ति और सौंदर्य भी धर्म के बिना स्थायी नहीं होते।

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