सुन्दर काण्ड चौपाई (57-64)

यह चौपाई सुन्दर काण्ड का है जिसमें हनुमानजी और विभीषण के संवाद को दिखाया गया है:

 चौपाई:

57

"सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।"

भावार्थ:

हे पवन पुत्र हनुमान! हमारे जीवन की दशा ऐसी है जैसे दस इन्द्रियों के बीच में विवेक रूपी एक जीभ अपनी मर्यादा में रहकर कार्य करती है। उसी प्रकार हम विपरीत वातावरण में भी अपनी श्रद्धा और भक्ति बनाए रखें — यह आप ही की कृपा से संभव है।

विवेचन:

यहाँ भक्त अपनी कठिन परिस्थिति और तुच्छता को व्यक्त करते हुए कह रहा है कि कठिन संसार में जहाँ अनेक विकार हैं, वहाँ एकमात्र हनुमानजी की कृपा से ही साधक सही मार्ग पर रह सकता है।

58.

"तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।"

भावार्थ:

हे तात (प्यारे हनुमानजी), जब प्रभु श्रीराम (भानुकुल नाथ) मुझे अनाथ (असहाय) जानेंगे, तब वे मुझ पर अवश्य ही कृपा करेंगे।

विवेचन:

इसमें भक्त की निष्कपट पुकार है। वह मानता है कि जब श्रीराम को पता चलेगा कि इस भक्त का कोई सहारा नहीं है, तो वे अपने स्वभाववश उस पर कृपा करेंगे क्योंकि श्रीराम तो दीनों पर दया करना अपना धर्म मानते हैं।

59.

"तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।"

भावार्थ:

मेरा शरीर तामसी (आसुरी प्रवृत्तियों से युक्त) है, मेरे पास कोई साधना नहीं है और न ही मन श्रीराम के चरणों में प्रेम रखता है।

विवेचन:

भक्त अपनी हीनता को स्वीकार कर रहा है। वह कहता है कि उसमें कोई विशेष साधना या गुण नहीं है, बल्कि उसका शरीर तामसिक है और मन में राम चरणों में स्थिरता या प्रेम नहीं है — फिर भी उसे आशा है कि राम कृपा करेंगे।

60.

"अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।"

भावार्थ:

अब मुझे आप पर भरोसा हो गया है, हे हनुमानजी! क्योंकि बिना श्रीहरि की कृपा के संतों की संगति नहीं मिलती।

विवेचन:

भक्त मानता है कि उसका हनुमानजी से मिलना और उनकी सेवा करना ये सब राम की कृपा से ही संभव है। संत संगति बहुत दुर्लभ है और वह भी केवल राम की कृपा से प्राप्त होती है।

61.

"जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।"

भावार्थ:

यदि श्रीराम ने मुझ पर अनुग्रह किया है तो उसी के कारण आपने मुझे दर्शन भी जबरदस्ती करवा दिए।

विवेचन:

यहाँ भक्त कहता है कि हनुमान का दर्शन कोई साधारण बात नहीं है। यह तभी संभव होता है जब श्रीराम की कृपा हो। "हठि दीन्हा" शब्द से भक्त अपनी अल्प पात्रता को दर्शा रहा है कि मैंने माँगा भी नहीं था, फिर भी कृपा मिली।

62.

"सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।"

भावार्थ:

हे विभीषण! सुनो, प्रभु श्रीराम की यह रीति (प्रकृति) है कि वे अपने सेवक से अत्यंत प्रेम करते हैं।

विवेचन:

यह चौपाई हनुमानजी ने विभीषण से कही थी। इसका सार यह है कि राम अपनी दयालुता और भक्तवत्सलता के लिए प्रसिद्ध हैं। वे जाति, कुल या योग्यता नहीं देखते — केवल सच्ची भक्ति देखते हैं। विभीषण राक्षस वंश का था, परन्तु राम ने उसे अपनाया।

63.

"कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।"

भावार्थ:

बताओ, मैं कौन सा महान कुल में उत्पन्न हुआ हूँ? मैं तो वानर हूँ, चंचल स्वभाव का और सब प्रकार से अयोग्य।

विवेचन:

हनुमानजी स्वयं को अत्यंत विनम्र भाव से प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि विभीषण को समझ आए कि राम तो ऐसे अयोग्य को भी अपनाते हैं, जैसे हनुमान। वह प्रेरित कर रहे हैं कि विभीषण बिना संकोच प्रभु की शरण ले।

64.

"प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।"

भावार्थ:

जो व्यक्ति सुबह के समय हमारा नाम लेता है, उस दिन उसे भोजन नहीं मिल पाता।

विवेचन:

यह ‘चुटीला व्यंग्य’ है। यह कहावत के रूप में विख्यात है। इसका भावार्थ यह है कि जो व्यक्ति सुबह हनुमान का नाम लेता है, वह इतने सद्गुण और पराक्रम से भर जाता है कि सारा दिन भगवान के कार्य करता रहता है और अपने लिए भोजन भी करना भूल जाता है।

निष्कर्ष (संक्षेप में):

इन चौपाइयों में भक्त के आत्मसमर्पण, अपनी हीनता की स्वीकृति, प्रभु की कृपालुता में दृढ़ विश्वास और हनुमानजी की महिमा का सुंदर चित्रण किया गया है। सबक यही है कि जब हम अहंकार त्यागकर राम अथवा उनके सेवक हनुमान की शरण में जाते हैं, तब हमारी सारी बाधाएँ स्वयं ही दूर हो जाती हैं।

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