सुन्दर काण्ड दोहा (3)

 सुन्दर काण्ड दोहा 3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

भावार्थ (सरल अर्थ)

हनुमानजी ने देखा कि लंका के नगर की रक्षा के लिए बहुत सारे रक्षक (रक्षासैनिक) तैनात हैं। यह देखकर हनुमानजी ने मन में विचार किया कि यदि मैं अपने विशाल रूप में यहाँ प्रवेश करूंगा तो पकड़ा जाऊँगा। इसलिए उन्होंने सोचा कि मैं अपना आकार बहुत छोटा कर लूँ और रात के समय लंका नगरी में प्रवेश करूँ।

विस्तृत विवेचन

प्रसंग

यह दोहा श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का है। जब हनुमानजी समुद्र पार करके लंका पहुँचते हैं, तब वे सीता माता की खोज के लिए लंका नगरी में प्रवेश करना चाहते हैं। लंका की सुरक्षा बहुत कड़ी थी, जगह-जगह राक्षस प्रहरी तैनात थे।

विवेचन

पुर रखवारे देखि बहु:

हनुमानजी ने देखा कि लंका के चारों ओर बहुत से रक्षक (राक्षस) पहरा दे रहे हैं। लंका की सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी।

कपि मन कीन्ह बिचार:

हनुमानजी ने मन में विचार किया कि यदि मैं अपने सामान्य (विशाल) रूप में यहाँ प्रवेश करता हूँ, तो रक्षकों की दृष्टि में आ जाऊँगा और मेरा उद्देश्य विफल हो जाएगा।

अति लघु रूप धरौं:

इसलिए हनुमानजी ने अपने रूप को अत्यंत छोटा करने का निश्चय किया। हनुमानजी को यह वरदान प्राप्त था कि वे इच्छानुसार अपना आकार बड़ा या छोटा कर सकते थे।

निसि नगर करौं पइसार:

हनुमानजी ने सोचा कि रात के समय जब लोग सो रहे होंगे, तब मैं लघु रूप धारण करके नगर में प्रवेश करूँगा और सीता माता की खोज करूँगा।

संदेश

इस दोहे के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी यह बताते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति को परिस्थिति के अनुसार अपनी योजना बनानी चाहिए। बल के साथ-साथ बुद्धि और विवेक का प्रयोग भी आवश्यक है। हनुमानजी ने यहाँ अपने बल का प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि परिस्थिति के अनुसार सूक्ष्मता और विवेक से कार्य करने का निर्णय लिया।

शिक्षा

किसी भी कार्य को करने से पहले उसकी परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन करना चाहिए।

केवल शक्ति या साहस से ही नहीं, बल्कि बुद्धि और विवेक से भी कार्य सिद्ध होते हैं।

सफलता के लिए समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार अपनी योजना में बदलाव करना चाहिए।

निष्कर्ष:

यह दोहा हमें सिखाता है कि केवल बल से नहीं, बल्कि बुद्धि और विवेक से भी कठिन कार्यों को सरलता से पूरा किया जा सकता है। हनुमानजी का यह व्यवहार हमारे लिए प्रेरणा है कि हमें हर कार्य में परिस्थिति के अनुसार विचार कर के ही कदम उठाना चाहिए।

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