सुन्दर काण्ड चौपाई(91-98)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 91-98 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।

खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।

नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।

यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।

तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

शब्दार्थ संक्षेप में:

त्रिजटा – एक राक्षसी, वृद्ध और विवेकी

राम चरन रति – श्रीराम के चरणों में भक्ति

सेइ – सेवा करो

सपना – स्वप्न

बानर लंका जारी – वानर द्वारा लंका जलाना

दससीसा – रावण

खंडित भुज बीसा – रावण की बीसों भुजाएँ कटी हुई

दोहाई – प्रार्थना

पठाई – भेजा

पुकारी – पुकारकर कहा

भावार्थ:

लंका की एक राक्षसी त्रिजटा थी जो बुद्धिमान और श्रीराम की भक्त थी। उसने सभी राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और सीता माता की सेवा करने की सलाह दी। उसने बताया कि उसके स्वप्न में वानरों ने लंका को जला दिया, राक्षसों की सेना नष्ट हो गई, रावण नग्न होकर गधे पर सवार हुआ, उसके सिर मुंडित हो गए और भुजाएँ कटी हुई थीं। फिर वह दक्षिण दिशा की ओर गया, जैसे लंका विभीषण को मिल गई हो। नगर में श्रीराम का जयघोष हुआ और सीता जी को प्रभु ने बुलवाया। त्रिजटा ने यह स्वप्न बताकर सबको कहा – "यह स्वप्न चार दिन में सत्य होगा।"

त्रिजटा की बातें सुनकर सभी राक्षसियाँ डर गईं और सीता जी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगीं।

विस्तृत विवेचन:

यह चौपाई सुंदरकांड में उस समय आती है जब सीता माता अशोक वाटिका में दुःखी और निराश बैठी हैं। त्रिजटा नाम की एक वृद्ध राक्षसी होती है जो विवेकशील और भगवान राम की भक्त होती है। त्रिजटा अपनी राक्षसी साथिनों को राम-भक्ति की राह पर चलने की सलाह देती है और अपना स्वप्न सुनाती है।

उसका स्वप्न सांकेतिक और भविष्यवाणीपूर्ण है — वह संकेत देता है कि श्रीराम की विजय निश्चित है, रावण का अंत निकट है, और सीता माता को शीघ्र ही मुक्ति मिलने वाली है।

इस स्वप्न का महत्व यह है कि यह आशा का संचार करता है, जब सब ओर निराशा छाई हो। साथ ही, यह त्रिजटा जैसे पात्र के माध्यम से यह संदेश देता है कि भक्ति और विवेक किसी भी जन्म या कुल तक सीमित नहीं है – एक राक्षसी भी रामभक्त हो सकती है।

चौपाई का अंत इस बात पर होता है कि त्रिजटा की बातों से सभी राक्षसियाँ डर गईं और सीता जी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगीं। यह राम की शक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक है।

निष्कर्ष:

यह चौपाई सुंदरकांड के उस मोड़ को दर्शाती है जहाँ श्रीराम की विजय की आशा स्पष्ट हो जाती है। त्रिजटा का स्वप्न भविष्य का संकेतक है, जो रावण के अंत और धर्म की जीत की ओर इशारा करता है।

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