सुन्दर काण्ड दोहा (7)

 सुन्दर काण्ड दोहा 7 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

यह दोहा हनुमान जी और विभीषण के बीच बातचीत का अंश है जब लंका में सीता की खोज के क्रम में विभीषण और हनुमान जी की मुलाकात हुई 

दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।"

शब्दार्थ:

अस मैं अधम – ऐसा मैं अधम (नीच और अयोग्य व्यक्ति) हू

सखा सुनु – हे मित्र! सुनो

मोहू पर रघुबीर कीन्ही कृपा – मुझ पर श्री रघुबीर (भगवान राम) ने कृपा की

सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर – उनके गुणों को स्मरण करके नेत्रों में प्रेमाश्रु भर आए

भावार्थ:

इस दोहे में हनुमान जी अपनी विनम्रता से कहते हैं कि —

“हे सखा! सुनो, मैं तो अत्यंत अधम, तुच्छ और दोषों से भरा हुआ प्राणी हूँ; फिर भी रघुनाथ भगवान (श्रीराम) ने मुझ पर कृपा की। जब मैं उनके गुणों को स्मरण करता हूँ, तो मेरे नेत्रों से प्रेम और श्रद्धा के आँसू बहने लगते हैं।”

विस्तृत विवेचन:

विनम्रता और भक्ति भाव:

हनुमान जी गहरे आत्मविलीन भाव में स्वयं को "अधम" कहकर भगवान की निष्काम कृपा को दर्शा रहे हैं। यह भक्त की चरम विनम्रता का प्रतीक है कि वह स्वयं को तुच्छ मानते हुए भगवान के अनुग्रह की प्रशंसा करता है।

प्रेमपूर्ण स्मरण: 

जब हनुमान जी भगवान श्रीराम के गुणों का स्मरण करते हैं, तो उनका मन इतना भावविभोर हो जाता है कि नेत्रों से आँसू बहने लगते हैं। यह दर्शाता है कि सच्चे भक्ति भाव में शारीरिक प्रतिक्रिया भी होती है — जैसे प्रेमाश्रु।

भगवान की अनुकंपा:

बिना किसी पात्रता के भी भगवान अपने भक्त पर कृपा करते हैं। यह दार्शनिक बिंदु वैष्णव भक्ति परंपरा में विशेष स्थान रखता है, जिसमें ‘कृपा’ को ही सर्वोपरि माना गया है।

‘सखा’ संबोधन:

"सखा" शब्द एक आत्मीय संबोधन है जो हनुमान जी और विभीषण को समीप लाता है वे अपने मन के भाव को विभीषण से बाँटते हैं, जो भक्त और ईश्वर या भक्त और समाज के बीच संवाद को मानवीय और सरल बनाता है।

आध्यात्मिक शिक्षा:

भगवान की कृपा किसी की योग्यता या धन-बल से नहीं मिलती, बल्कि निष्कलंक भक्ति और समर्पण से प्राप्त होती है।

भाव शुद्ध हो तो भक्त और भगवान का संबंध अत्यंत सघन हो जाता है।

आत्मग्लानि और दीनता नकारात्मक नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति का रूप है जब वह भगवान की कृपा से मिलती हो।

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