सुन्दर काण्ड दोहा (13)

 सुन्दर काण्ड दोहा 13 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा –

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।

जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

शब्दार्थ

कपि – हनुमान जी

सप्रेम – प्रेमपूर्वक

बिस्वास – विश्वास

मन, क्रम, बचन – मन से, कर्म (क्रिया) से, वचन (बोल) से

कृपासिंधु – करुणा के सागर, भगवान राम

दास – सेवक

भावार्थ (सरल अर्थ)

सीता जी ने जब हनुमान जी के प्रेमपूर्वक कहे वचन सुने, तब उनके मन में विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह वानर (हनुमान) मन, वचन और कर्म से प्रभु राम के परम भक्त और सेवक हैं।

विवेचन (व्याख्या)

यह दोहा उस समय का है जब हनुमान जी ने सीता जी को राम का संदेश सुनाया और उनके साथ प्रेमपूर्वक संवाद किया। हनुमान जी की बातों में इतना सच्चा प्रेम, भक्ति और विश्वास था कि सीता जी का रघुनाथजी पर विश्वास और भी दृढ़ हो गया।

हनुमान जी ने जो कुछ कहा, वह श्रीराम की भक्ति से पूर्ण था। सीता जी ने अनुभव किया कि यह वानर केवल बोलने में नहीं, बल्कि अपने संपूर्ण जीवन—मन, वचन और कर्म—से भगवान श्रीराम का भक्त है।

हनुमान जी की इस संपूर्ण निष्ठा को देखकर सीता जी का मन शांत हुआ और उन्हें भरोसा हुआ कि अब प्रभु उन्हें अवश्य बचाएँगे।

शिक्षा

सच्ची भक्ति मन, वचन और कर्म से होनी चाहिए।

प्रेम और विश्वास से कहे गए वचन दूसरों के मन में भरोसा जगाते हैं।

प्रभु के

 दूत (जैसे हनुमान जी) हमें आशा और शक्ति देते हैं।

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