सुन्दर काण्ड चौपाई (73-81)

 

चौपाई

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।

तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।

अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।

सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

भावार्थ (सरल भाषा में):

हनुमान जी पेड़ की पत्तियों में छिपकर यह विचार कर रहे हैं कि अब क्या करना चाहिए। तभी रावण बहुत सारी स्त्रियों और साज-सज्जा के साथ सीता माता के पास आता है। वह अनेक प्रकार से उन्हें बहकाने की कोशिश करता है — कभी प्रेम से, कभी दान का लालच देकर, कभी डराकर और कभी छल से।

रावण कहता है — हे सुंदर और बुद्धिमती स्त्री! मेरी रानियाँ तो मंदोदरी आदि हैं, पर मैं तुम्हें अपनी मुख्य रानी बनाऊँगा। बस एक बार मेरी ओर देख लो।

परन्तु सीता जी घास की ओट लेकर बैठ जाती हैं और भगवान राम को स्मरण कर कहती हैं —

"हे रावण! जैसे जुगनू का प्रकाश कमल को नहीं खिला सकता, वैसे ही तू मुझे मोहित नहीं कर सकता।"

वे आगे कहती हैं — "तू नीच और निर्लज्ज है, तुझे श्रीराम के बाणों का भय भी नहीं है। मूर्ख! तू मुझे भले अकेली समझ रहा है, पर श्रीराम स्वयं मुझे लेने आएँगे।"

विस्तृत विवेचन:

इस प्रसंग में रावण की नीचता और सीता माता की दृढ़ता, धर्मनिष्ठा व मर्यादा का चित्रण है।

1. रावण का छल-प्रपंच:

रावण सीता जी को अपने वश में करने के लिए हर उपाय अपनाता है —

साम (प्रेम), दान (लालच), भय (डर) और भेद (चालाकी)।

लेकिन वह बार-बार असफल होता है।

2. सीता की दृढ़ता:

सीता माता पूरी नारी शक्ति की प्रतीक बनकर रावण को तिरस्कारपूर्वक उत्तर देती हैं। वह कहती हैं —

"हे दुष्ट! तू मुझे अकेली समझ रहा है, पर श्रीराम का तेज तुझे शीघ्र नष्ट करेगा।"

3. उपमा का प्रयोग:

सीता जी रावण को यह भी समझाती हैं कि जैसे

“जुगनू का प्रकाश कमल को खिला नहीं सकता,”

वैसे ही रावण की माया व आकर्षण उन्हें विचलित नहीं कर सकते।

4. श्रीराम का स्मरण:

संकट के समय सीता जी ‘अवधपति श्रीराम’ का स्मरण करती हैं, जो भक्तों को आश्रय देने वाले हैं।

निष्कर्ष:

यह चौपाई रामायण में नारी के आत्मबल, पवित्रता और संयम का अमर उदाहरण है। रावण की सारी मायावी कोशिशें एक सती नारी के संकल्प के आगे विफल हो जाती हैं।

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