सुन्दर काण्ड चौपाई (24-26)

 सुन्दर काण्ड चौपाई 24-26 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।

एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।

तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।

बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

भावार्थ

हनुमान जी जब समुद्र पार कर रहे थे, तब मार्ग में अनेक बाधाएँ आईं। उन्हीं में से एक 'सिंहिका' नामक राक्षसी थी, जो अपनी छाया पकड़कर आकाश में उड़ने वाले प्राणियों को नीचे गिरा देती थी और फिर उन्हें खा जाती थी। जब हनुमान जी समुद्र पार कर रहे थे, तब सिंहिका ने भी उनकी छाया पकड़ ली, जिससे हनुमान जी का आगे बढ़ना रुक गया। हनुमान जी ने तुरंत उसकी चालाकी (कपट) को पहचान लिया और उसे मार डाला। फिर वे वीरता और धैर्य के साथ समुद्र पार कर गए।

शब्दार्थ

गहइ छाहँ — छाया पकड़ती है

सक सो न उड़ाई — जिससे कोई उड़ नहीं सकता

गगनचर — आकाश में चलने वाले (उड़ने वाले)

खाई — खा जाती है

छल — कपट, चालाकी

मारुतसुत — पवनपुत्र (हनुमान जी)

बीरा — वीर

बारिधि पार — समुद्र पार

मतिधीरा — बुद्धिमान और धैर्यवान

विस्तृत विवेचन

1. प्रसंग

हनुमान जी लंका की ओर जा रहे हैं। मार्ग में उन्हें अनेक बाधाएँ आती हैं—पहले सुरसा, फिर सिंहिका। सिंहिका एक मायावी राक्षसी थी, जो आकाश में उड़ने वाले जीवों की छाया पकड़कर उन्हें नीचे गिरा देती थी और खा जाती थी।

2. सिंहिका का कपट और हनुमान जी की बुद्धिमत्ता

हनुमान जी की छाया पकड़कर सिंहिका उन्हें रोक लेती है। परंतु हनुमान जी उसकी चाल को तुरंत समझ जाते हैं। वे जानते हैं कि यह एक मायावी राक्षसी है, जो छल से जीवों का वध करती है। हनुमान जी अपनी बुद्धि और शक्ति का प्रयोग करते हैं, और सिंहिका का वध कर देते हैं।

3. प्रतीकात्मक अर्थ

सिंहिका — हमारे जीवन की वे बाधाएँ हैं, जो छाया की तरह हमारी प्रगति को रोकती हैं। ये बाधाएँ अक्सर कपट, छल, या भ्रम के रूप में आती हैं।

हनुमान जी — विवेक, साहस और शक्ति का प्रतीक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन में आने वाली मायावी समस्याओं को पहचानकर, साहस और बुद्धि से उनका समाधान करना चाहिए।

समुद्र पार करना — लक्ष्य की ओर बढ़ना, जिसमें अनेक बाधाएँ आती हैं।

4. शिक्षा

बुद्धि और शक्ति का संतुलन: केवल बल से नहीं, बल्कि बुद्धि और धैर्य से भी समस्याओं का समाधान संभव है।

कपट को पहचानना: जीवन में आने वाले छल-कपट को तुरंत पहचानना और उस पर उचित कार्रवाई करना आवश्यक है।

धैर्य और साहस: किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए धैर्य, साहस और विवेक आवश्यक हैं।

निष्कर्ष

इस चौपाई के माध्यम से तुलसीदास जी ने यह सिखाया है कि जीवन यात्रा में जब भी कोई बाधा (सिंहिका) हमारे मार्ग को रोकती है, तो हमें हनुमान जी की तरह विवेक और साहस से उसका सामना करना चाहिए। छल-कपट की पहचान कर, उसे दूर करके ही हम अपने लक्ष्य (समुद्र पार) तक पहुँच सकते हैं।

यह चौपाई हमें प्रेरणा देती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और बुद्धि का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहिए।

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