सुन्दर काण्ड चौपाई (82-90)
चौपाई:
"सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
भावार्थ:
यह प्रसंग उस समय का है जब अशोक वाटिका में अपनी पत्नी के साथ सीता माता को समझाने जाता है और सीता रावण की तुलना जुगनू से और राम की तुलना सूर्य से करती है। इस पर रावण क्रोधित हो जाता है और अपनी तलवार निकाल लेता है और क्रोध में सीता माता को कहता है।
यहां रावण माता सीता से क्रोधित होकर कहता है:
"हे सीते! तूने मेरा अपमान किया है। यदि तू मेरी बात नहीं मानेगी, तो मैं अपनी तेज़ तलवार से तेरा सिर काट दूँगा।
यदि तू तुरंत मेरी बात स्वीकार कर ले, तो तेरा जीवन बच सकता है। तू अत्यंत सुंदर है, जैसे श्याम कमल की माला।
तेरे गले में मैं अपनी भुजाएँ (बाहें) डालूँगा जो मेरी तलवार जैसी मजबूत हैं।
सुन दुष्ट! यह मेरी प्रतिज्ञा है। मेरी तलवार 'चंद्रहास' है, वही मेरे दुख को हर लेगी जो राम के विरह में उत्पन्न हुआ है।
इसकी ठंडी धार से मैं अपना संताप शांत करना चाहता हूँ। सीता! तू मेरा दुःख दूर कर।
यह सुनकर रावण फिर क्रोध में आकर मारने दौड़ता है, पर मंदोदरी आदि रानियाँ समझा-बुझाकर रोकती हैं।
रावण दैतिनियों को बुलाकर कहता है: "इस सीता को तरह-तरह से डराओ, त्रास दो।
यदि एक महीने के भीतर यह मेरी बात नहीं माने, तो मैं इसे तलवार से मार डालूँगा।"
विस्तृत विवेचन:
यह चौपाई सुंदरकांड का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें रावण के अहंकार, क्रोध और पाप प्रवृत्ति का चित्रण मिलता है। जब सीता माता रावण के सभी प्रलोभनों और धमकियों को ठुकरा देती हैं, तब रावण का क्रोध अपने चरम पर पहुँचता है।
यहाँ वह अपने दंभ में सीता को मारने तक की धमकी देता है, परंतु यह भी साफ है कि उसके भीतर एक असहाय क्रोध है – जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति न होने पर दमन और हिंसा का रास्ता अपनाता है।
Comments
Post a Comment